अध्याय १८
अध्याय १८: मोक्षसंन्यासयोग
Moksha Sannyasa Yoga
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श्लोक १८.१
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास के तत्व को और त्याग के तत्व को अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
श्लोक १८.२
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥२॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: ज्ञानी पुरुष काम्य कर्मों (कामनायुक्त कर्मों) के त्याग को ‘संन्यास’ जानते हैं, और सभी कर्मों के फलों के त्याग को विद्वान् लोग ‘त्याग’ कहते हैं।
श्लोक १८.३
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥३॥
अनुवाद: कुछ मनीषी पुरुष ऐसा कहते हैं कि कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्यागने योग्य है, किंतु दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
श्लोक १८.४
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥४॥
अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! इस त्याग के विषय में मेरा निश्चित निर्णय सुन। हे पुरुषव्याघ्र! त्याग वास्तव में तीन प्रकार का कहा गया है।
श्लोक १८.५
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥५॥
अनुवाद: यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि वह करने योग्य ही है; क्योंकि यज्ञ, दान और तप – ये तीनों ही मनस्वी पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं।
श्लोक १८.६
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥६॥
अनुवाद: किंतु हे पार्थ! इन कर्मों को भी आसक्ति और फलों का त्याग करके कर्तव्य समझकर करना चाहिए – यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
श्लोक १८.७
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥७॥
अनुवाद: नियत (शास्त्रोक्त) कर्म का स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। मोह के कारण उसका त्याग कर देना तमोगुण का त्याग कहा गया है।
श्लोक १८.८
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥८॥
अनुवाद: जो कर्म शारीरिक कष्ट के भय से “यह दुखदायक है” ऐसा समझकर छोड़ देता है, वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक १८.९
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥९॥
अनुवाद: हे अर्जुन! जो नियत कर्म केवल ‘यह कर्तव्य है’ ऐसा समझकर, आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है, वह सात्त्विक त्याग माना गया है।
श्लोक १८.१०
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥१०॥
अनुवाद: जो मनुष्य प्रतिकूल कर्म से द्वेष नहीं करता और अनुकूल कर्म में आसक्त नहीं होता, वह सत्त्वगुण से युक्त, बुद्धिमान और संशयरहित सच्चा त्यागी है।
श्लोक १८.११
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥११॥
अनुवाद: शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा संपूर्ण कर्मों को पूरी तरह त्यागना संभव नहीं है; किंतु जो मनुष्य कर्मों के फल का त्याग करता है, वही वास्तव में ‘त्यागी’ कहा जाता है।
श्लोक १८.१२
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥१२॥
अनुवाद: कर्मों का फल तीन प्रकार का होता है – अवांछित, वांछित और मिला-जुला – जो कर्म फल का त्याग नहीं करते, उन्हें मृत्यु के बाद अपने कर्मों के अनुसार यह फल मिलता है, किंतु संन्यासियों (फलत्यागियों) को कभी नहीं मिलता।
श्लोक १८.१३
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१३॥
अनुवाद: हे महाबाहो! संपूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिए सांख्य शास्त्र (वेदांत) में ये पाँच कारण बताए गए हैं, उन्हें मुझसे समझ ले।
श्लोक १८.१४
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥१४॥
अनुवाद: वे पाँच कारण हैं – शरीर (अधिष्ठान), कर्ता, विभिन्न प्रकार के करण (इंद्रियाँ), अलग-अलग प्रकार की चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव (भाग्य या अदृश्य शक्ति)।
श्लोक १८.१५
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१५॥
अनुवाद: मनुष्य शरीर से, वाणी से और मन से जो भी उचित या अनुचित कर्म आरंभ करता है, उसके ये पाँचों कारण होते हैं।
श्लोक १८.१६
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥१६॥
अनुवाद: ऐसा होने पर भी जो अशुद्ध बुद्धि वाला मनुष्य अपनी आत्मा को (जो कि वास्तव में अकर्ता है) अकेला ही सबका कर्ता समझता है, वह दुर्बुद्धि मनुष्य तत्व को नहीं देखता।
श्लोक १८.१७
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१७॥
अनुवाद: जिसके मन में अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि किसी भी रूप में आसक्त नहीं होती, वह यदि इन सारे लोकों को भी मार डाले, तो भी वह न तो किसी को मारता है और न ही बंधन में बंधता है।
श्लोक १८.१८
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥१८॥
अनुवाद: ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता – यह तीन प्रकार की कर्म की प्रेरणा है; तथा करण, कर्म और कर्ता – यह तीन प्रकार का कर्म का संग्रह है।
श्लोक १८.१९
ज्ञानं कर्म च कर्ताच त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥१९॥
अनुवाद: गुणसंख्यान (सांख्य शास्त्र) के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता – ये तीनों भी गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं। उन्हें भी मुझसे भली-भांति सुन।
श्लोक १८.२०
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥२०॥
अनुवाद: जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सभी अलग-अलग दिखने वाले प्राणियों में एक ही अविनाशी और सम भाव को देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान।
श्लोक १८.२१
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥२१॥
अनुवाद: किंतु जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य विभिन्न प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के नाना भावों और पृथक सत्त्वों को देखता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।
श्लोक १८.२२
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥२२॥
अनुवाद: और जो ज्ञान किसी एक कार्य (जैसे शरीर आदि) में ही बिना किसी यथार्थ कारण के संपूर्ण मानकर आसक्त रहता है, जो अवास्तविक, तुच्छ और सारहीन है, वह तामस ज्ञान कहा गया है।
श्लोक १८.२३
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥२३॥
अनुवाद: जो नियत कर्म आसक्ति से रहित, राग-द्वेष से दूर और फल की इच्छा न रखने वाले पुरुष द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक कर्म कहलाता है।
श्लोक १८.२४
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥२४॥
अनुवाद: किंतु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है और कामनाओं को चाहने वाले या अहंकार से भरे हुए मनुष्य द्वारा किया जाता है, वह राजस कर्म कहा गया है।
श्लोक १८.२५
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥२५॥
अनुवाद: जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोह के कारण आरंभ किया जाता है, वह तामस कर्म कहा जाता है।
श्लोक १८.२६
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥२६॥
अनुवाद: जो कर्ता आसक्ति से रहित, अहंकाररहित, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सिद्धि और असिद्धि में समान रहने वाला है, वह ‘सात्त्विक कर्ता’ कहा जाता है।
श्लोक १८.२७
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥२७॥
अनुवाद: जो कर्ता आसक्ति से युक्त, कर्मों के फल को चाहने वाला, लोभी, दूसरों को कष्ट देने वाला (हिंसात्मक), अशुचि (अपवित्र), तथा हर्ष और शोक से युक्त है, वह ‘राजस कर्ता’ कहा गया है।
श्लोक १८.२८
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥२८॥
अनुवाद: जो कर्ता अयुक्त (असंयमी), अशिक्षित (प्राकृत), घमंडी, शठ, दूसरों की जीविका छीनने वाला (नैष्कृतिक), आलसी, विषादी और काम को बहुत लंबी अवधि तक टालने वाला (दीर्घसूत्री) है, वह ‘तामस कर्ता’ कहा जाता है।
श्लोक १८.२९
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥२९॥
अनुवाद: हे धनंजय! अब तू गुणों के अनुसार बुद्धि और धैर्य के भी तीन प्रकार के भेदों को मुझसे विस्तारपूर्वक सुन।
श्लोक १८.३०
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥३०॥
अनुवाद: हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को, तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है, वह बुद्धि ‘सात्त्विकी’ है।
श्लोक १८.३१
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥३१॥
अनुवाद: हे पार्थ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को यथार्थ रूप से नहीं जानता (विपरीत समझता) है, वह बुद्धि ‘राजसी’ है।
श्लोक १८.३२
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥३२॥
अनुवाद: हे पार्थ! जो बुद्धि अंधकार से ढकी हुई अधर्म को ही धर्म मान लेती है और अन्य सभी बातों को भी विपरीत ही समझती है, वह बुद्धि ‘तामसी’ है।
श्लोक १८.३३
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥३३॥
अनुवाद: हे पार्थ! जिस अटूट धैर्य के द्वारा मनुष्य योग (मन-इंद्रियों के संयम) के माध्यम से मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को सदा वश में रखता है, वह धैर्य ‘सात्त्विक’ है।
श्लोक १८.३४
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥३४॥
अनुवाद: हे अर्जुन! किंतु जिस धैर्य के द्वारा फल की इच्छा रखने वाला मनुष्य अत्यंत आसक्ति के साथ धर्म, अर्थ और काम का सेवन करता है, वह धैर्य ‘राजसी’ है।
श्लोक १८.३५
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥३५॥
अनुवाद: हे पार्थ! दुर्बुद्धि मनुष्य जिस धैर्य के कारण स्वप्न (आलस्य), भय, शोक, विषाद और मद (उन्माद/घमंड) को नहीं छोड़ता, वह धैर्य ‘तामसी’ है।
श्लोक १८.३६
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥३६॥
अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी मुझसे सुन, जिसके अभ्यास से मनुष्य आनंदित होता है और दुखों के अंत को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक १८.३७
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥३७॥
अनुवाद: जो सुख आरंभ में विष के समान प्रतीत होता है, किंतु परिणाम में अमृत के समान आनंददायक होता है – वह आत्मबुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होने वाला सुख ‘सात्त्विक’ कहा गया है।
श्लोक १८.३८
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥३८॥
अनुवाद: जो सुख विषयों और इंद्रियों के संयोग से आरंभ में अमृत के समान प्रतीत होता है, किंतु परिणाम में विष के समान दुखदायी होता है – वह सुख ‘राजस’ माना गया है।
श्लोक १८.३९
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥३९॥
अनुवाद: जो सुख आरंभ में और परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, तथा निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है – वह सुख ‘तामस’ कहा गया है।
श्लोक १८.४०
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥४०॥
अनुवाद: पृथ्वी पर या स्वर्ग में देवताओं के बीच ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से पूरी तरह मुक्त हो।
श्लोक १८.४१
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥४१॥
अनुवाद: हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म उनके अपने स्वभाव के गुणों के अनुसार अलग-अलग बाँटे गए हैं।
श्लोक १८.४२
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥४२॥
अनुवाद: शम (मन का शमन), दम (इंद्रियों का दमन), तपस्या, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य (ईश्वर में विश्वास) – ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
श्लोक १८.४३
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥४३॥
अनुवाद: शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुराई, युद्ध से पीठ न दिखाना, दान देना और प्रभुत्व (नेतृत्व) – ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
श्लोक १८.४४
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥४४॥
अनुवाद: खेती, गौ-पालन और व्यापार (वाणिज्य) – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं, और सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।
श्लोक १८.४५
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥४५॥
अनुवाद: मनुष्य अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्पर रहकर ही परम सिद्धि को प्राप्त करता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को प्राप्त करता है, उसे सुन।
श्लोक १८.४६
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥४६॥
अनुवाद: जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह संपूर्ण जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.४७
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥४७॥
अनुवाद: अच्छी तरह आचरण किए गए दूसरे के धर्म (कर्म) से, गुणहीन होने पर भी अपना स्वधर्म श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत किए गए कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक १८.४८
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥४८॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! दोषयुक्त होने पर भी अपने स्वाभाविक कर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से वैसे ही ढके रहते हैं जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है।
श्लोक १८.४९
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥४९॥
अनुवाद: जिसकी बुद्धि हर जगह आसक्ति से रहित है, जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो सभी इच्छाओं से मुक्त है, वह संन्यास (कर्मफल के त्याग) के द्वारा उस परम ‘नैष्कर्म्य सिद्धि’ (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.५०
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥५०॥
अनुवाद: जो मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो चुका है, वह जिस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे हे कौन्तेय! तू संक्षेप में मुझसे जान, जो ज्ञान की पराकाष्ठा (निष्ठा) है।
श्लोक १८.५१–५३
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥५१॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥५२॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥५३॥
अनुवाद: शुद्ध बुद्धि से युक्त, धैर्य के द्वारा मन को वश में करने वाला; शब्द आदि विषयों को छोड़कर राग और द्वेष को दूर करने वाला; एकांत स्थान में रहने वाला, कम खाने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला; निरंतर ध्यान योग में तत्पर और वैराग्य का आश्रय लेने वाला; अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और संग्रह को त्यागकर – ममत्व से रहित और शांत पुरुष ब्रह्मभाव को प्राप्त होने के योग्य हो जाता है।
श्लोक १८.५४
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥५४॥
अनुवाद: ब्रह्म को प्राप्त हुआ, प्रसन्न अंतःकरण वाला पुरुष न तो किसी के लिए शोक करता है और न कोई कामना करता है। सभी प्राणियों में समान भाव रखने वाला वह भक्त मेरी परा भक्ति को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.५५
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥५५॥
अनुवाद: भक्ति के द्वारा ही वह मुझको (मेरे वास्तविक रूप को) जैसा हूँ वैसा तत्व से जानता है, और उस तत्व से जानकर वह तत्काल मुझमें प्रवेश कर जाता है।
श्लोक १८.५६
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥५६॥
अनुवाद: सभी कर्मों को हमेशा करता हुआ भी मेरे परायण हुआ भक्त मेरी कृपा से सनातन और अविनाशी परम पद को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.५७
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥५७॥
अनुवाद: संपूर्ण कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, बुद्धि-योग का आश्रय लेते हुए तू निरंतर मुझमें ही चित्त वाला हो जा।
श्लोक १८.५८
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥५८॥
अनुवाद: मुझमें चित्त लगाने से तू मेरी कृपा से सभी कठिनाइयों को पार कर जाएगा; किंतु यदि अहंकार के कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा, तो नष्ट हो जाएगा।
श्लोक १८.५९
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥५९॥
अनुवाद: अहंकार का आश्रय लेकर यदि तू यह सोचता है कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा,” तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरी प्रकृति तुझे जबरन युद्ध में प्रवृत्त कर देगी।
श्लोक १८.६०
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत् ॥६०॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म के द्वारा बँधा हुआ तू मोह के कारण जो कर्म नहीं करना चाहता, उसे भी विवश होकर करेगा।
श्लोक १८.६१
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥६१॥
अनुवाद: हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है, और अपनी माया से सभी प्राणियों को शरीर रूपी यंत्र पर आरूढ़ (सवार) कराकर घुमाता रहता है।
श्लोक १८.६२
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥६२॥
अनुवाद: हे भारत! तू सब प्रकार से उसी परमेश्वर की शरण में जा। उसी की कृपा से तू परम शांति और सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।
श्लोक १८.६३
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥६३॥
अनुवाद: इस प्रकार यह मैंने तुझे अति गोपनीय से भी अधिक गोपनीय ज्ञान कह दिया है। इस संपूर्ण रहस्य को अच्छी तरह विचार कर, जैसा तू चाहता है वैसा कर।
श्लोक १८.६४
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥६४॥
अनुवाद: संपूर्ण गोपनीयों में भी अति गोपनीय मेरे इस परम वचन को तू फिर से सुन। तू मुझे बहुत प्रिय है, इसलिए मैं तेरे हित की बात कहूँगा।
श्लोक १८.६५
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥६५॥
अनुवाद: तू मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर और मुझे नमस्कार कर। तू निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगा – यह मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मुझे बहुत प्रिय है।
श्लोक १८.६६
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥६६॥
अनुवाद: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को मुझमें त्यागकर तू केवल मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर।
श्लोक १८.६७
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥६७॥
अनुवाद: इस गोपनीय गीता का उपदेश न तो कभी किसी तपहीन को करना चाहिए, न भक्तिहीन को, न सेवा न करने वाले को, और न ही मुझसे द्वेष करने वाले को।
श्लोक १८.६८
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥६८॥
अनुवाद: जो पुरुष मेरे इन परम गोपनीय रहस्यों को मेरे भक्तों के सामने कहेगा, वह मुझमें परा भक्ति को प्राप्त करके निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगा।
श्लोक १८.६९
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥६९॥
अनुवाद: मनुष्यों में ऐसा मेरा कोई प्रिय कार्य करने वाला नहीं है, और न कभी पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा कोई दूसरा प्रिय होगा।
श्लोक १८.७०
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥७०॥
अनुवाद: और जो पुरुष हमारे इस धर्मयुक्त संवाद को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञान-यज्ञ से पूजित होऊँगा – ऐसा मेरा मत है।
श्लोक १८.७१
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥७१॥
अनुवाद: जो मनुष्य श्रद्धा से युक्त और दोष-दृष्टि से रहित होकर केवल सुनता भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यकर्म करने वालों के उत्तम लोकों को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.७२
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥७२॥
अनुवाद: हे पार्थ! क्या इसे तूने एकाग्र चित्त से सुना? हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञान और मोह दूर हो गया है?
श्लोक १८.७३
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥७३॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति (ज्ञान) प्राप्त हो गई है। अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, और आपकी आज्ञा के अनुसार ही कार्य करूँगा।
श्लोक १८.७४
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥७४॥
अनुवाद: संजय ने कहा: इस प्रकार मैंने वासुदेव (श्रीकृष्ण) और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देने वाले संवाद को सुना।
श्लोक १८.७५
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥७५॥
अनुवाद: महर्षि व्यास की कृपा से मैंने इस अत्यंत गोपनीय योग को स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से कहते हुए सुना है।
श्लोक १८.७६
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥७६॥
अनुवाद: हे राजन्! श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस पवित्र और अद्भुत संवाद को बार-बार याद करके मैं अत्यधिक हर्षित हो रहा हूँ।
श्लोक १८.७७
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७॥
अनुवाद: और हे राजन्! श्री भगवान के उस अति अद्भुत विश्वरूप को बार-बार याद करके मेरे मन में महान विस्मय हो रहा है, और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
श्लोक १८.७८
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥७८॥
अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गांडीवधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री (समृद्धि), विजय, असाधारण शक्ति और नीति अचल रूप से निश्चित हैं – ऐसा मेरा मत है।