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अध्याय १

अध्याय १: अर्जुनविषादयोग

Arjuna Vishada Yoga

श्लोक पर जाएँ: १ · २ · ३ · ४ · ५ · ६ · ७ · ८ · ९ · १० · ११ · १२ · १३ · १४ · १५ · १६ · १७ · १८ · १९ · २० · २१–२२ · २३ · २४ · २५ · २६ · २७ · २८ · २९ · ३० · ३१ · ३२ · ३३ · ३४ · ३५ · ३६ · ३७ · ३८ · ३९ · ४० · ४१ · ४२ · ४३ · ४४ · ४५ · ४६ · ४७


श्लोक १.१

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥

अनुवाद: धृतराष्ट्र ने कहा: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?


श्लोक १.२

सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥२॥

अनुवाद: संजय ने कहा: उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचना युक्त पाण्डवों की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।


श्लोक १.३

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥

अनुवाद: हे आचार्य! पाण्डुपुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसकी व्यूह-रचना आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपद-पुत्र (धृष्टद्युम्न) ने की है।


श्लोक १.४

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥

अनुवाद: इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि, विराट और महारथी राजा द्रुपद हैं।


श्लोक १.५

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः ॥५॥

अनुवाद: धृष्टकेतु, चेकितान, बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य हैं।


श्लोक १.६

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥६॥

अनुवाद: पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) और द्रौपदी के पुत्र – ये सभी महारथी हैं।


श्लोक १.७

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥७॥

अनुवाद: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हमारे पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उन्हें आप समझ लें। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो नायक हैं, उनके नाम मैं आपको बताता हूँ।


श्लोक १.८

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥८॥

अनुवाद: आप (द्रोणाचार्य), पितामह भीष्म, कर्ण और युद्ध विजयी कृपाचार्य, तथा अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र (भूरिश्रवा) हैं।


श्लोक १.९

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥९॥

अनुवाद: और भी बहुत से शूरवीर हैं, जिन्होंने मेरे लिए अपने जीवन की आशा त्याग दी है। वे सभी अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित हैं और युद्धकला में अत्यंत निपुण हैं।


श्लोक १.१०

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥१०॥

अनुवाद: पितामह भीष्म द्वारा रक्षित हमारी वह सेना असीमित है, जबकि भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की सेना सीमित है।


श्लोक १.११

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥११॥

अनुवाद: इसलिए आप सभी लोग मोर्चों पर अपने-अपने स्थानों में स्थित रहते हुए, सब ओर से पितामह भीष्म की ही रक्षा करें।


श्लोक १.१२

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥१२॥

अनुवाद: कौरवों में सबसे वृद्ध और प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए, सिंह की दहाड़ के समान जोर से गरजकर शंख बजाया।


श्लोक १.१३

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥१३॥

अनुवाद: उसके पश्चात शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंघे एक साथ ही बज उठे। वह शब्द बड़ा भयंकर था।


श्लोक १.१४

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४॥

अनुवाद: इसके बाद, सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाए।


श्लोक १.१५

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५॥

अनुवाद: श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया और भयंकर कर्म करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।


श्लोक १.१६

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१६॥

अनुवाद: कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया, और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए।


श्लोक १.१७

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥१७॥

अनुवाद: हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट और अजेय सात्यकि…


श्लोक १.१८

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥१८॥

अनुवाद: हे पृथ्वीपते! द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, और महाबाहु सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) – इन सभी ने सब ओर से अपने-अपने शंख बजाए।


श्लोक १.१९

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥१९॥

अनुवाद: उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को गुंजाते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) के हृदयों को विदीर्ण कर दिया।


श्लोक १.२०

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥२०॥

अनुवाद: हे राजन्! इसके बाद, अर्जुन, जिनके रथ की ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान थे, ने कौरवों को मोर्चों पर डटे हुए देखकर और शस्त्र चलने की तैयारी के समय अपना धनुष उठाकर श्रीकृष्ण से यह वचन कहा।


श्लोक १.२१–२२

अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥२१॥

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२॥

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे अच्युत (श्रीकृष्ण)! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए, ताकि मैं युद्ध की अभिलाषा से यहाँ एकत्र हुए इन लोगों को देख सकूँ कि इस युद्ध-व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।


श्लोक १.२३

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥२३॥

अनुवाद: दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में भला चाहने वाले जो-जो राजा लोग यहाँ इस सेना में आए हैं, युद्ध करने को उत्सुक उन सबको मैं देखूंगा।


श्लोक १.२४

सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥

अनुवाद: संजय ने कहा: हे भरतवंशी (धृतराष्ट्र)! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस उत्तम रथ को खड़ा करके…


श्लोक १.२५

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥२५॥

अनुवाद: भीष्म, द्रोणाचार्य और सम्पूर्ण राजाओं के सामने कहा: हे पार्थ! यहाँ इकट्ठे हुए इन कुरुवंशियों को देखो।


श्लोक १.२६

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥२६॥

अनुवाद: तब पृथापुत्र (अर्जुन) ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को देखा।


श्लोक १.२७

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥२७॥

अनुवाद: दोनों सेनाओं में स्थित ससुरों को और सुहृदों (शुभचिन्तकों) को भी देखा। उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धु-बान्धवों को देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन…


श्लोक १.२८

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥२८॥

अनुवाद: अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले। अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से यहाँ उपस्थित इन स्वजनों को देखकर…


श्लोक १.२९

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥२९॥

अनुवाद: मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है; मेरे शरीर में कम्पन हो रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।


श्लोक १.३०

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥३०॥

अनुवाद: हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है। मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है, और मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हूँ।


श्लोक १.३१

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥३१॥

अनुवाद: हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत देख रहा हूँ, और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर कोई कल्याण भी नहीं देखता।


श्लोक १.३२

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥३२॥

अनुवाद: हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य और न ही सुखों को। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से, भोगों से अथवा जीवन से भी क्या लाभ है?


श्लोक १.३३

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥३३॥

अनुवाद: जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे ही अपने प्राणों और धनों की आशा त्यागकर इस युद्ध में खड़े हैं।


श्लोक १.३४

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४॥

अनुवाद: गुरुजन, ताऊ-चाचे, पुत्र और उसी प्रकार दादे, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य सम्बन्धी यहाँ हैं।


श्लोक १.३५

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥३५॥

अनुवाद: हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी, अथवा त्रिलोकी के राज्य के लिए भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या!


श्लोक १.३६

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥३६॥

अनुवाद: हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से हमें पाप ही लगेगा।


श्लोक १.३७

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥३७॥

अनुवाद: इसलिए, हे माधव! अपने बन्धु-बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए योग्य नहीं है। अपने ही कुटुम्बियों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?


श्लोक १.३८

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥

अनुवाद: यद्यपि लोभ से भ्रष्ट चित्त वाले ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से द्रोह करने में पाप को नहीं देखते।


श्लोक १.३९

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥

अनुवाद: किन्तु हे जनार्दन! कुल के नाश से होने वाले दोष को स्पष्ट देखने वाले हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?


श्लोक १.४०

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥

अनुवाद: कुल का नाश होने पर सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं; धर्म के नष्ट हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप (अधर्म) बहुत फैल जाता है।


श्लोक १.४१

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥४१॥

अनुवाद: हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं; और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।


श्लोक १.४२

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥४२॥

अनुवाद: वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। श्राद्ध और तर्पण की क्रियाओं से वंचित होकर इनके पितर भी गिर जाते हैं।


श्लोक १.४३

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥४३॥

अनुवाद: वर्णसंकर पैदा करने वाले इन कुलघातकों के इन दोषों से सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं।


श्लोक १.४४

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥

अनुवाद: हे जनार्दन! जिनके कुल-धर्म नष्ट हो गए हैं, ऐसे मनुष्यों का निश्चित रूप से नरक में वास होता है, ऐसा हमने सुना है।


श्लोक १.४५

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥

अनुवाद: अहो! यह बड़े खेद की बात है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिए तैयार हो गए हैं।


श्लोक १.४६

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥४६॥

अनुवाद: यदि शस्त्र रहित और सामना न करने वाले मुझे, हाथों में शस्त्र लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मार भी डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।


श्लोक १.४७

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥४७॥

अनुवाद: संजय ने कहा: युद्धभूमि में इस प्रकार कहकर, शोक से संतप्त मन वाले अर्जुन बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए।


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