Skip to content
-
Subscribe to our newsletter & never miss our best posts. Subscribe Now!
Shrimad Bhagavad Gita

Gita Essence

Shrimad Bhagavad Gita

Gita Essence

  • Home
  • Lord Krishna
  • Shrimad Bhagavad Gita
    • Shrimad Bhagavad Gita (Explained View)
    • Shrimad Bhagavad Gita (English)
      • Chapter 1
      • Chapter 2
      • Chapter 3
      • Chapter 4
      • Chapter 5
      • Chapter 6
      • Chapter 7
      • Chapter 8
      • Chapter 9
      • Chapter 10
      • Chapter 11
      • Chapter 12
      • Chapter 13
      • Chapter 14
      • Chapter 15
      • Chapter 16
      • Chapter 17
      • Chapter 18
    • Shrimad Bhagavad Gita (Hindi)
      • अध्याय १
      • अध्याय २
      • अध्याय ३
      • अध्याय ४
      • अध्याय ५
      • अध्याय ६
      • अध्याय ७
      • अध्याय ८
      • अध्याय ९
      • अध्याय १०
      • अध्याय ११
      • अध्याय १२
      • अध्याय १३
      • अध्याय १४
      • अध्याय १५
      • अध्याय १६
      • अध्याय १७
      • अध्याय १८
  • About Us
  • Home
  • Lord Krishna
  • Shrimad Bhagavad Gita
    • Shrimad Bhagavad Gita (Explained View)
    • Shrimad Bhagavad Gita (English)
      • Chapter 1
      • Chapter 2
      • Chapter 3
      • Chapter 4
      • Chapter 5
      • Chapter 6
      • Chapter 7
      • Chapter 8
      • Chapter 9
      • Chapter 10
      • Chapter 11
      • Chapter 12
      • Chapter 13
      • Chapter 14
      • Chapter 15
      • Chapter 16
      • Chapter 17
      • Chapter 18
    • Shrimad Bhagavad Gita (Hindi)
      • अध्याय १
      • अध्याय २
      • अध्याय ३
      • अध्याय ४
      • अध्याय ५
      • अध्याय ६
      • अध्याय ७
      • अध्याय ८
      • अध्याय ९
      • अध्याय १०
      • अध्याय ११
      • अध्याय १२
      • अध्याय १३
      • अध्याय १४
      • अध्याय १५
      • अध्याय १६
      • अध्याय १७
      • अध्याय १८
  • About Us
Close

Search

  • https://www.facebook.com/
  • https://twitter.com/
  • https://t.me/
  • https://www.instagram.com/
  • https://youtube.com/
Subscribe

अध्याय ५

अध्याय ५: कर्मसंन्यासयोग

Karma Sannyasa Yoga

श्लोक पर जाएँ: १ · २ · ३ · ४ · ५ · ६ · ७ · ८–९ · १० · ११ · १२ · १३ · १४ · १५ · १६ · १७ · १८ · १९ · २० · २१ · २२ · २३ · २४ · २५ · २६ · २७–२८ · २९


श्लोक ५.१

अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥१॥

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर योग (कर्मयोग) की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से जो एक मेरे लिए अति कल्याणकारी हो, उसे निश्चित करके कहिए।


श्लोक ५.२

श्रीभगवानुवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥२॥

अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: संन्यास (कर्मों का त्याग) और कर्मयोग – ये दोनों ही परम कल्याण को देने वाले हैं। किंतु उन दोनों में भी कर्मों के संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।


श्लोक ५.३

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥३॥

अनुवाद: हे महाबाहो! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि राग-द्वेष आदि द्वन्द्वों से रहित मनुष्य सुखपूर्वक बंधन से मुक्त हो जाता है।


श्लोक ५.४

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥४॥

अनुवाद: सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग को अज्ञानी जन अलग-अलग कहते हैं, न कि ज्ञानी। इनमें से एक में भी अच्छी तरह स्थित हुआ पुरुष दोनों के फल को प्राप्त कर लेता है।


श्लोक ५.५

यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥

अनुवाद: ज्ञानयोगियों द्वारा जो स्थान प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही स्थान प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को एक रूप में देखता है, वही वास्तव में देखता है।


श्लोक ५.६

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥६॥

अनुवाद: किंतु हे महाबाहो! बिना कर्मयोग के संन्यास प्राप्त करना कठिन है। योगयुक्त मननशील मुनि ब्रह्म को शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।


श्लोक ५.७

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥७॥

अनुवाद: जो कर्मयोग से युक्त है, जिसका अंतःकरण शुद्ध है, जिसने अपने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है, और जो संपूर्ण प्राणियों की आत्मा ही अपनी आत्मा है, ऐसा पुरुष कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।


श्लोक ५.८–९

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥८॥

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥९॥

अनुवाद: तत्व को जानने वाला योगयुक्त पुरुष देखता, सुनता, स्पर्श करता, सूंघता, भोजन करता, चलता, सोता, श्वास लेता हुआ… बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते और बंद करते हुए भी यही मानता है कि “मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ,” बल्कि इन्द्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।


श्लोक ५.१०

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥१०॥

अनुवाद: जो पुरुष संपूर्ण कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पाप से ऐसे सुरक्षित रहता है जैसे कमल का पत्ता जल से अप्रभावित रहता है।


श्लोक ५.११

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥११॥

अनुवाद: योगी जन केवल शरीर से, मन से, बुद्धि से और इन्द्रियों द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।


श्लोक ५.१२

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥१२॥

अनुवाद: कर्मयोग से युक्त पुरुष कर्मों के फल का त्याग करके नैष्ठिकी (भगवत्प्राप्ति रूपी) शांति को प्राप्त होता है, जबकि जो अयुक्त है (जो योग से रहित है) वह कामना के कारण फल में आसक्त होकर बंध जाता है।


श्लोक ५.१३

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥१३॥

अनुवाद: सब कर्मों को मन से त्यागकर, वश में करने वाला वह देही पुरुष नौ द्वारों वाले इस शरीर रूपी नगर में न तो कुछ करते हुए और न ही किसी से कुछ करवाते हुए सुखपूर्वक आनंद से रहता है।


श्लोक ५.१४

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥१४॥

अनुवाद: परमेश्वर न तो किसी के कर्तृत्व की, न कर्मों की और न ही कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं। यह सब तो प्रकृति का स्वभाव ही प्रवृत्त होता है।


श्लोक ५.१५

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥

अनुवाद: परमेश्वर न तो किसी के पाप कर्म को और न ही किसी के पुण्य कर्म को ग्रहण करते हैं। अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है, जिससे सब जीव मोहित होते हैं।


श्लोक ५.१६

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥१६॥

अनुवाद: किंतु जिनका वह अज्ञान आत्मज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के समान उस परमतत्व को प्रकाशित कर देता है।


श्लोक ५.१७

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥१७॥

अनुवाद: जिनका मन उसी में स्थित है, जिनकी बुद्धि उसी रूप हो रही है, और जिनका परम आश्रय वही परमतत्व है, ऐसे ज्ञान द्वारा जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, वे पुरुष अपुनरावृत्ति (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।


श्लोक ५.१८

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥१८॥

अनुवाद: ज्ञानी जन विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चांडाल में भी समान रूप से देखने वाले (समदर्शी) होते हैं।


श्लोक ५.१९

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥१९॥

अनुवाद: जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इसी जीवित अवस्था में संपूर्ण संसार जीत लिया गया है। निर्दोष और सम होने के कारण वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।


श्लोक ५.२०

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥२०॥

अनुवाद: जो प्रिय वस्तु को पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय को पाकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिर बुद्धि वाला, संशय रहित और ब्रह्म को जानने वाला पुरुष ब्रह्म में ही स्थित रहता है।


श्लोक ५.२१

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥२१॥

अनुवाद: बाहर के विषयों में आसक्ति से रहित अंतःकरण वाला पुरुष जो आत्मिक सुख प्राप्त करता है, वह ब्रह्मयोग से युक्त अंतःकरण वाला पुरुष अक्षय सुख का अनुभव करता है।


श्लोक ५.२२

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥२२॥

अनुवाद: विषयों और इंद्रियों के संयोग से उत्पन्न होने वाले जितने भी भोग हैं, वे सभी दुखों के कारण हैं और आदि-अंत वाले (नाशवान) हैं। हे कुन्तीपुत्र! ज्ञानी पुरुष उनमें रमण नहीं करता।


श्लोक ५.२३

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥२३॥

अनुवाद: जो मनुष्य इस शरीर के छूटने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही इस संसार में सुखी है।


श्लोक ५.२४

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥२४॥

अनुवाद: जो पुरुष अंतःकरण में ही सुख पाने वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है, और जो अंतःकरण में ही प्रकाश (ज्ञान) वाला है, वह योगी ब्रह्मभूत होकर शांत ब्रह्म (मोक्ष) को प्राप्त होता है।


श्लोक ५.२५

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥२५॥

अनुवाद: जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके संशय छिन्न-भिन्न हो गए हैं, जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है, और जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, ऐसे ऋषि ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होते हैं।


श्लोक ५.२६

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥२६॥

अनुवाद: काम और क्रोध से रहित, जीते हुए मन वाले, और आत्म-स्वरूप को जानने वाले संन्यासी पुरुषों के लिए सब ओर से ब्रह्म-निर्वाण सुरक्षित है।


श्लोक ५.२७–२८

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥२७॥

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥२८॥

अनुवाद: बाहर के विषयों को बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच में स्थित करके, तथा नासिका में बहने वाले प्राण और अपान वायु को समान करके, जो मुनि अपनी इंद्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लेता है तथा इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा मुक्त हो जाता है, वह मोक्षपरायण पुरुष सदा मुक्त ही है।


श्लोक ५.२९

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥२९॥

अनुवाद: मुझे संपूर्ण यज्ञों और तपों का भोगने वाला, संपूर्ण लोकों का महान ईश्वर, और सभी भूतों का सुहृद (मित्र) जानकर, मेरा भक्त शांति को प्राप्त होता है।


Recent Posts

  • Lord Krishna: A Devotee’s Reflection

Recent Comments

No comments to show.

Archives

  • August 2026

Categories

  • Lord Krishna
Copyright 2026 — Shrimad Bhagavad Gita. All rights reserved. Blogsy WordPress Theme