Skip to content
-
Subscribe to our newsletter & never miss our best posts. Subscribe Now!
Shrimad Bhagavad Gita

Gita Essence

Shrimad Bhagavad Gita

Gita Essence

  • Home
  • Lord Krishna
  • Shrimad Bhagavad Gita
    • Shrimad Bhagavad Gita (Explained View)
    • Shrimad Bhagavad Gita (English)
      • Chapter 1
      • Chapter 2
      • Chapter 3
      • Chapter 4
      • Chapter 5
      • Chapter 6
      • Chapter 7
      • Chapter 8
      • Chapter 9
      • Chapter 10
      • Chapter 11
      • Chapter 12
      • Chapter 13
      • Chapter 14
      • Chapter 15
      • Chapter 16
      • Chapter 17
      • Chapter 18
    • Shrimad Bhagavad Gita (Hindi)
      • अध्याय १
      • अध्याय २
      • अध्याय ३
      • अध्याय ४
      • अध्याय ५
      • अध्याय ६
      • अध्याय ७
      • अध्याय ८
      • अध्याय ९
      • अध्याय १०
      • अध्याय ११
      • अध्याय १२
      • अध्याय १३
      • अध्याय १४
      • अध्याय १५
      • अध्याय १६
      • अध्याय १७
      • अध्याय १८
  • About Us
  • Home
  • Lord Krishna
  • Shrimad Bhagavad Gita
    • Shrimad Bhagavad Gita (Explained View)
    • Shrimad Bhagavad Gita (English)
      • Chapter 1
      • Chapter 2
      • Chapter 3
      • Chapter 4
      • Chapter 5
      • Chapter 6
      • Chapter 7
      • Chapter 8
      • Chapter 9
      • Chapter 10
      • Chapter 11
      • Chapter 12
      • Chapter 13
      • Chapter 14
      • Chapter 15
      • Chapter 16
      • Chapter 17
      • Chapter 18
    • Shrimad Bhagavad Gita (Hindi)
      • अध्याय १
      • अध्याय २
      • अध्याय ३
      • अध्याय ४
      • अध्याय ५
      • अध्याय ६
      • अध्याय ७
      • अध्याय ८
      • अध्याय ९
      • अध्याय १०
      • अध्याय ११
      • अध्याय १२
      • अध्याय १३
      • अध्याय १४
      • अध्याय १५
      • अध्याय १६
      • अध्याय १७
      • अध्याय १८
  • About Us
Close

Search

  • https://www.facebook.com/
  • https://twitter.com/
  • https://t.me/
  • https://www.instagram.com/
  • https://youtube.com/
Subscribe

अध्याय २

अध्याय २: सांख्ययोग

Sankhya Yoga

श्लोक पर जाएँ: १ · २ · ३ · ४ · ५ · ६ · ७ · ८ · ९ · १० · ११ · १२ · १३ · १४ · १५ · १६ · १७ · १८ · १९ · २० · २१ · २२ · २३ · २४ · २५ · २६ · २७ · २८ · २९ · ३० · ३१ · ३२ · ३३ · ३४ · ३५ · ३६ · ३७ · ३८ · ३९ · ४० · ४१ · ४२–४३ · ४४ · ४५ · ४६ · ४७ · ४८ · ४९ · ५० · ५१ · ५२ · ५३ · ५४ · ५५ · ५६ · ५७ · ५८ · ५९ · ६० · ६१ · ६२ · ६३ · ६४ · ६५ · ६६ · ६७ · ६८ · ६९ · ७० · ७१ · ७२


श्लोक २.१

सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥१॥

अनुवाद: संजय ने कहा: इस प्रकार करुणा से घिरे हुए, आंसुओं से भरे व्याकुल नेत्रों वाले और शोक करते हुए उस (अर्जुन) से मधुसूदन (श्रीकृष्ण) ने ये शब्द कहे।


श्लोक २.२

श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥

अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे अर्जुन! इस संकट के समय में तुम्हारे भीतर यह अज्ञान (मोह) कहाँ से आ गया? यह श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण के योग्य नहीं है, न ही यह स्वर्ग देने वाला है और न ही कीर्ति प्रदान करने वाला है।


श्लोक २.३

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥३॥

अनुवाद: हे पार्थ! कायरता को प्राप्त मत हो, यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है। हे परन्तप (शत्रुओं को तपाने वाले)! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।


श्लोक २.४

अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥४॥

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! हे शत्रुओं के नाशक! मैं युद्धभूमि में भीष्म और द्रोण जैसे पूजनीय पुरुषों पर बाणों से कैसे प्रहार करूँगा?


श्लोक २.५

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५॥

अनुवाद: महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस संसार में भीख मांगकर खाना भी मैं अधिक श्रेयस्कर मानता हूँ। क्योंकि गुरुजनों को मारकर इस लोक में खून से सने हुए धन और कामनाओं रूपी भोगों को ही तो भोगूंगा।


श्लोक २.६

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्-
तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥६॥

अनुवाद: हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है – उन्हें जीतना या उनके द्वारा हार जाना। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़े हैं।


श्लोक २.७

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥७॥

अनुवाद: कायरता रूपी दोष के कारण नष्ट हुए स्वभाव वाला और धर्म के विषय में भ्रमित मन वाला मैं आपसे पूछता हूँ। जो मेरे लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताएँ। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, कृपया मुझे शिक्षा दें।


श्लोक २.८

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८॥

अनुवाद: क्योंकि भूमि पर बिना शत्रुओं का धन-धान्य से संपन्न राज्य और देवताओं का स्वामीपन प्राप्त कर लेने पर भी, मैं ऐसा कुछ नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।


श्लोक २.९

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥९॥

अनुवाद: संजय ने कहा: शत्रुओं को तपाने वाले गुडाकेश (अर्जुन) ने अन्तर्यामी श्रीकृष्ण से ऐसा कहकर, “हे गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा“, यह स्पष्ट रूप से कहा और चुप हो गए।


श्लोक २.१०

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥१०॥

अनुवाद: हे भरतवंशी (धृतराष्ट्र)! तब दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन से श्रीकृष्ण ने मानो मुस्कुराते हुए ये वचन कहे।


श्लोक २.११

श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥११॥

अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और फिर ज्ञानियों की तरह बातें भी करते हो। ज्ञानी जन उनके लिए शोक नहीं करते जिनके प्राण चले गए हैं, और उनके लिए भी नहीं जिनके प्राण नहीं गए हैं।


श्लोक २.१२

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥१२॥

अनुवाद: ऐसा कभी नहीं था कि मैं किसी समय में नहीं था, या तुम नहीं थे, या ये सभी राजा नहीं थे; और ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे।


श्लोक २.१३

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥१३॥

अनुवाद: जैसे इस देह में देहधारी आत्मा को बचपन, जवानी और बुढ़ापा प्राप्त होता है, वैसे ही मृत्यु के बाद उसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है। धीर पुरुष इस विषय में मोहग्रस्त नहीं होते।


श्लोक २.१४

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥१४॥

अनुवाद: हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों के विषयों से होने वाले सम्पर्क सर्दी, गर्मी, सुख और दुख देने वाले हैं। वे उत्पत्ति और विनाश वाले तथा अनित्य हैं। हे भरतवंशी! तुम उन्हें सहन करना सीखो।


श्लोक २.१५

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥१५॥

अनुवाद: हे पुरुषोत्तम! जो धीर मनुष्य सुख और दुख में समान रहता है और इन इन्द्रिय विषयों से विचलित नहीं होता, वह निश्चित ही मोक्ष (अमरता) के योग्य हो जाता है।


श्लोक २.१६

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६॥

अनुवाद: असत् (जो अस्थायी है) का कोई अस्तित्व नहीं है, और सत् (जो शाश्वत है) का कभी अभाव नहीं होता। सत्य को जानने वालों ने इन दोनों के वास्तविक स्वरूप का भली-भांति दर्शन किया है।


श्लोक २.१७

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥१७॥

अनुवाद: उसे तुम अविनाशी जानो जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है। इस नष्ट न होने वाले तत्व का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।


श्लोक २.१८

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥१८॥

अनुवाद: इस अविनाशी, अप्रमेय और नित्य आत्मा के ये भौतिक शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए, हे भरतवंशी! तुम युद्ध करो।


श्लोक २.१९

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥१९॥

अनुवाद: जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है, और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं; क्योंकि यह आत्मा न तो किसी को मारता है और न ही मारा जाता है।


श्लोक २.२०

न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२०॥

अनुवाद: यह आत्मा किसी भी काल में न तो जन्म लेता है और न ही मरता है। न ही यह ऐसा है कि उत्पन्न होकर फिर कभी होने वाला है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।


श्लोक २.२१

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१॥

अनुवाद: हे पार्थ! जो मनुष्य यह जानता है कि यह आत्मा अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय (अपरिवर्तनीय) है, वह किसी को कैसे मार सकता है या किसी को कैसे मरवा सकता है?


श्लोक २.२२

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२२॥

अनुवाद: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करती है।


श्लोक २.२३

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३॥

अनुवाद: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग इसे जला नहीं सकती, जल इसे भिगो नहीं सकता, और वायु इसे सुखा नहीं सकती।


श्लोक २.२४

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४॥

अनुवाद: यह आत्मा काटी नहीं जा सकती, जलाई नहीं जा सकती, भिगोई नहीं जा सकती और सुखाई नहीं जा सकती। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।


श्लोक २.२५

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥२५॥

अनुवाद: यह आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और विकाररहित (परिवर्तन रहित) कही जाती है। इसलिए आत्मा को ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।


श्लोक २.२६

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥२६॥

अनुवाद: और यदि तुम इस आत्मा को सदा जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानते हो, तो भी हे महाबाहो! तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।


श्लोक २.२७

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२७॥

अनुवाद: क्योंकि जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मर गया है उसका जन्म निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य (जिसे टाला न जा सके) विषय पर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।


श्लोक २.२८

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥२८॥

अनुवाद: हे भरतवंशी! सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट (अव्यक्त) थे, जन्म और मृत्यु के बीच प्रकट (व्यक्त) रहते हैं, और मृत्यु के बाद फिर से अप्रकट हो जाते हैं। इसमें शोक करने की क्या बात है?


श्लोक २.२९

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥२९॥

अनुवाद: कोई इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है, कोई दूसरा इसका आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है, कोई अन्य इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है, और सुनकर भी कोई इसे वास्तव में समझ नहीं पाता।


श्लोक २.३०

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥३०॥

अनुवाद: हे भरतवंशी! सबके शरीर में रहने वाली यह आत्मा नित्य अवध्य है (इसे कभी मारा नहीं जा सकता)। इसलिए किसी भी प्राणी के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।


श्लोक २.३१

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥३१॥

अनुवाद: अपने क्षत्रिय धर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए; क्योंकि धर्म के लिए युद्ध करने से बढ़कर एक क्षत्रिय के लिए अन्य कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं है।


श्लोक २.३२

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥३२॥

अनुवाद: हे पार्थ! वे क्षत्रिय बड़े भाग्यशाली हैं जिन्हें ऐसा युद्ध अपने आप प्राप्त होता है, जो कि उनके लिए खुले हुए स्वर्ग के द्वार के समान है।


श्लोक २.३३

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥३३॥

अनुवाद: किन्तु यदि तुम इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करोगे, तो अपने धर्म और कीर्ति को खो दोगे, और तुम्हें पाप लगेगा।


श्लोक २.३४

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥३४॥

अनुवाद: लोग सदा तुम्हारी अपकीर्ति का वर्णन करेंगे, और एक सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है।


श्लोक २.३५

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥३५॥

अनुवाद: जिन महारथियों की दृष्टि में तुम बहुत सम्मानित रहे हो, वे तुम्हें तुच्छ समझेंगे और यही मानेंगे कि तुमने भय के कारण युद्ध क्षेत्र छोड़ दिया है।


श्लोक २.३६

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६॥

अनुवाद: तुम्हारे शत्रु तुम्हारी सामर्थ्य की निन्दा करते हुए तुम्हें बहुत से न कहने योग्य शब्द कहेंगे। तुम्हारे लिए इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है?


श्लोक २.३७

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥३७॥

अनुवाद: हे कुन्तीपुत्र! या तो तुम युद्ध में मारे जाकर स्वर्ग प्राप्त करोगे, या फिर विजयी होकर पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए युद्ध का दृढ़ निश्चय करके खड़े हो जाओ।


श्लोक २.३८

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥३८॥

अनुवाद: सुख और दुख, लाभ और हानि, तथा जय और पराजय को समान मानकर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। इस प्रकार युद्ध करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।


श्लोक २.३९

एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥३९॥

अनुवाद: हे पार्थ! यह ज्ञान मैंने तुम्हें सांख्य योग (ज्ञान योग) के अनुसार बताया है। अब तुम इसे निष्काम कर्मयोग के विषय में सुनो, जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बन्धन को पूरी तरह काट डालोगे।


श्लोक २.४०

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४०॥

अनुवाद: इस कर्मयोग में न तो आरम्भ का नाश होता है और न ही कोई विपरीत परिणाम (दोष) होता है। इस धर्म का थोड़ा सा भी अभ्यास बड़े भारी भय (जन्म-मृत्यु के चक्र) से बचा लेता है।


श्लोक २.४१

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥४१॥

अनुवाद: हे कुरुनन्दन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है; किन्तु जो अस्थिर विचार वाले विवेकरहित सकाम मनुष्य हैं, उनकी बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं।


श्लोक २.४२–४३

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥४२॥

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥४३॥

अनुवाद: हे पार्थ! जो अज्ञानी लोग वेदों के उन वाक्यों में प्रीति रखते हैं जो केवल सकाम कर्मों की प्रशंसा करते हैं, और जो यह कहते हैं कि इसके सिवाय और कुछ नहीं है। जो कामनाओं से भरे हुए हैं और स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानते हैं, वे लोग भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए जन्म-मरण रूपी फल देने वाली अनेक प्रकार की सकाम क्रियाओं का वर्णन करने वाली दिखावटी (पुष्पित) बातें करते हैं।


श्लोक २.४४

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥४४॥

अनुवाद: उन दिखावटी बातों द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, ऐसे मनुष्यों की परमात्मा में एकनिष्ठ (निश्चयात्मक) बुद्धि नहीं होती।


श्लोक २.४५

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥

अनुवाद: हे अर्जुन! वेद मुख्य रूप से प्रकृति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) के कार्यरूप संसार का वर्णन करने वाले हैं। तुम इन तीनों गुणों से ऊपर उठो, सुख-दुख आदि द्वन्द्वों से रहित हो जाओ, नित्य सत्त्वगुण में स्थित रहो, योग-क्षेम (अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा) की चिन्ता से मुक्त और आत्मपरायण बनो।


श्लोक २.४६

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥४६॥

अनुवाद: सब ओर से परिपूर्ण विशाल जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे कुएँ का जितना उपयोग रह जाता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ज्ञानी ब्राह्मण के लिए समस्त वेदों का भी उतना ही उपयोग रह जाता है।


श्लोक २.४७

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥४७॥

अनुवाद: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मों के फल का कारण मत बनो, और कर्म न करने (अकर्मण्यता) में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।


श्लोक २.४८

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥

अनुवाद: हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (विफलता) में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म करो। यह समत्व भाव ही ‘योग’ कहलाता है।


श्लोक २.४९

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥४९॥

अनुवाद: हे धनञ्जय! समत्व बुद्धि योग की तुलना में सकाम कर्म अत्यन्त निम्न श्रेणी का है। इसलिए तुम समबुद्धि (निष्काम भाव) की शरण ग्रहण करो। फल की इच्छा से कर्म करने वाले लोग अत्यन्त कृपण (दयनीय) हैं।


श्लोक २.५०

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥५०॥

अनुवाद: समबुद्धि युक्त पुरुष इसी संसार में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है (अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है)। इसलिए तुम समत्व रूपी योग में लग जाओ। कर्मों में कुशलता ही योग है।


श्लोक २.५१

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥५१॥

अनुवाद: क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानी जन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्म-मरण रूपी बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और उस परम निर्विकार परमपद को प्राप्त कर लेते हैं।


श्लोक २.५२

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥५२॥

अनुवाद: जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूपी दलदल को पूरी तरह पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य (इस लोक और परलोक के) सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाओगे।


श्लोक २.५३

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥

अनुवाद: अनेक प्रकार के वचनों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि जब परमात्मा के ध्यान (समाधि) में स्थिर और अचल हो जाएगी, तब तुम योग (परमात्मा से मिलन) को प्राप्त करोगे।


श्लोक २.५४

अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥५४॥

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे केशव! समाधि में स्थित, स्थिर बुद्धि वाले (स्थितप्रज्ञ) पुरुष के क्या लक्षण हैं? वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?


श्लोक २.५५

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥

अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! जब मनुष्य मन में उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूरी तरह त्याग देता है और अपनी आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह ‘स्थितप्रज्ञ’ (स्थिर बुद्धि वाला) कहा जाता है।


श्लोक २.५६

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥

अनुवाद: दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जिसकी कोई लालसा नहीं रहती, और जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से पूर्णतः मुक्त हो गया है, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि वाला (स्थितप्रज्ञ) कहा जाता है।


श्लोक २.५७

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५७॥

अनुवाद: जो पुरुष सर्वत्र आसक्ति रहित होता है, और उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त करके न तो प्रसन्न होता है और न ही द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।


श्लोक २.५८

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८॥

अनुवाद: और जिस प्रकार कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार जब यह मनुष्य इन्द्रियों के विषयों से अपनी इन्द्रियों को पूरी तरह खींच लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।


श्लोक २.५९

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥५९॥

अनुवाद: इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति (रस) बनी रहती है। लेकिन परम तत्त्व (परमात्मा) का साक्षात्कार कर लेने पर इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की वह आसक्ति भी निवृत्त हो जाती है।


श्लोक २.६०

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥६०॥

अनुवाद: हे कुन्तीपुत्र! क्योंकि ये इन्द्रियाँ इतनी प्रमथनशील (बलवान) हैं कि ये यत्न करते हुए विवेकशील पुरुष के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं।


श्लोक २.६१

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६१॥

अनुवाद: उन समस्त इन्द्रियों को वश में करके, योगी को चाहिए कि वह मुझमें ही मन लगाकर मत्पर (मेरे परायण) होकर बैठे। क्योंकि जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।


श्लोक २.६२

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥६२॥

अनुवाद: विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है, आसक्ति से कामना (इच्छा) पैदा होती है, और कामना में बाधा आने से क्रोध उत्पन्न होता है।


श्लोक २.६३

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥६३॥

अनुवाद: क्रोध से अत्यंत मोह (विभ्रम) उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति भ्रमित होने से बुद्धि का नाश हो जाता है, और बुद्धि का नाश होने से वह मनुष्य खुद नष्ट हो जाता है।


श्लोक २.६४

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥६४॥

अनुवाद: किंतु अपने अधीन की हुई इन्द्रियों द्वारा, राग और द्वेष से रहित होकर विषयों में विचरण करने वाला मनुष्य अंतःकरण की प्रसन्नता (प्रसाद) को प्राप्त होता है।


श्लोक २.६५

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥६५॥

अनुवाद: अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर उस मनुष्य के सम्पूर्ण दुखों का नाश हो जाता है; और प्रसन्न चित्त वाले ऐसे मनुष्य की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से स्थिर हो जाती है।


श्लोक २.६६

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥६६॥

अनुवाद: जो योग से युक्त नहीं है (जिसकी बुद्धि स्थिर नहीं है), उसकी निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती; और उस अयुक्त मनुष्य के अंतःकरण में भावना (शांति) भी नहीं होती। शान्ति रहित मनुष्य को सुख कहाँ से मिल सकता है?


श्लोक २.६७

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥६७॥

अनुवाद: जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु बहा ले जाती है, वैसे ही विचरण करने वाली इन्द्रियों में से जिसके साथ मन लगा रहता है, वह मन उस मनुष्य की स्थिर बुद्धि को हर लेता है।


श्लोक २.६८

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८॥

अनुवाद: इसलिए हे महाबाहो! जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार से वश में की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।


श्लोक २.६९

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥६९॥

अनुवाद: जो सब जीवों के लिए रात्रि (अंधकार स्वरूप या अज्ञात) है, उस परमतत्व में संयमी पुरुष जागता है; और जिस संसार में सब जीव जागते हैं, वह तत्वदर्शी मुनि के लिए रात्रि के समान (उपेक्षा के योग्य) है।


श्लोक २.७०

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥

अनुवाद: जैसे दोनों ओर से जल के आने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा में स्थिर रहता है और अडिग रहता है, वैसे ही सब कामनाएँ जिस मनुष्य में बिना विकार के प्रवेश करती हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों की कामना करने वाला नहीं।


श्लोक २.७१

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥७१॥

अनुवाद: जो मनुष्य समस्त कामनाओं को त्यागकर, ममता रहित, अहंकार रहित और निःस्पृह होकर विचरण करता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है।


श्लोक २.७२

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥७२॥

अनुवाद: हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति (ब्रह्म को प्राप्त स्थिति) है। इसे प्राप्त होकर मनुष्य कभी मोह को नहीं प्राप्त होता। अंतकाल में भी इस स्थिति में स्थित होकर वह ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।


Recent Posts

  • Lord Krishna: A Devotee’s Reflection

Recent Comments

No comments to show.

Archives

  • August 2026

Categories

  • Lord Krishna
Copyright 2026 — Shrimad Bhagavad Gita. All rights reserved. Blogsy WordPress Theme