अध्याय ६
अध्याय ६: आत्मसंयमयोग
Atma Samyama Yoga
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श्लोक ६.१
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है; न तो अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी है और न ही केवल कर्मों को छोड़ने वाला अक्रिय व्यक्ति।
श्लोक ६.२
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥२॥
अनुवाद: हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को तू योग जान; क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी मनुष्य योगी नहीं हो सकता।
श्लोक ६.३
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥३॥
अनुवाद: योग पर आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील मुनि के लिए कर्म ही साधन कहा जाता है, और जब वह योग पर आरूढ़ हो जाता है, तब शम (मन की शांति और कर्मों से उपरामता) ही उसका साधन कहा जाता है।
श्लोक ६.४
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥४॥
अनुवाद: जब मनुष्य न तो इंद्रियों के विषयों में और न ही कर्मों में आसक्त होता है, तथा संपूर्ण संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह “योगारूढ़” (योग में स्थित) कहा जाता है।
श्लोक ६.५
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥५॥
अनुवाद: मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी आत्मा के द्वारा अपना उद्धार करे, और अपने को नीचे न गिराए (पतन न होने दे); क्योंकि यह मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।
श्लोक ६.६
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६॥
अनुवाद: जिस मनुष्य ने अपनी आत्मा को अपने द्वारा जीत लिया है, उसकी आत्मा ही उसकी मित्र है; किंतु जिसने आत्मा को नहीं जीता है, उसकी आत्मा शत्रु के समान शत्रुता करती है।
श्लोक ६.७
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥७॥
अनुवाद: जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो शांत चित्त है, उसकी परमात्मा में पूर्ण रूप से स्थिति है – ठंड और गर्मी, सुख और दुख, तथा मान और अपमान में उसका चित्त समान रहता है।
श्लोक ६.८
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥८॥
अनुवाद: जिसका अंतःकरण ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो विकार रहित और विजितेन्द्रिय है, तथा जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण एक समान हैं, वह योगी “युक्त” (सिद्ध) कहा जाता है।
श्लोक ६.९
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥
अनुवाद: सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, और बंधुओं में, तथा साधुओं और पापियों में भी जो समान बुद्धि रखता है, वह पुरुष विशेष रूप से श्रेष्ठ है।
श्लोक ६.१०
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१०॥
अनुवाद: योगी को चाहिए कि वह एकांत स्थान में स्थित रहकर, अकेले ही मन और शरीर को वश में करते हुए, तथा आशा और संग्रह से रहित होकर निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाए।
श्लोक ६.११
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥११॥
अनुवाद: पवित्र स्थान में, जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा, जिस पर क्रमशः कुश, मृगचर्म और वस्त्र बिछे हों, ऐसा अपना स्थिर आसन स्थापित करे।
श्लोक ६.१२
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥१२॥
अनुवाद: उस आसन पर बैठकर, मन और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, चित्त को एकाग्र करके अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
श्लोक ६.१३
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥१३॥
अनुवाद: शरीर, सिर और गर्दन को समान (सीधा) तथा अचल और स्थिर रखते हुए, अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर टिकाकर और इधर-उधर न देखते हुए…
श्लोक ६.१४
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥१४॥
अनुवाद: शांत अंतःकरण वाला, भय से रहित, ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, मन को पूरी तरह संयम में रखकर मुझमें चित्त लगाने वाला और मेरे परायण होकर आसन पर बैठे।
श्लोक ६.१५
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥१५॥
अनुवाद: मन को वश में रखने वाला योगी निरंतर इस प्रकार आत्मा को मुझमें लगाता हुआ, मेरे स्वरूप में स्थित रहने वाली परम शांति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
श्लोक ६.१६
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥१६॥
अनुवाद: हे अर्जुन! न तो बहुत खाने वाले का योग सिद्ध होता है, और न ही बिल्कुल न खाने वाले (फाका करने वाले) का; न ही बहुत सोने वाले का और न ही हमेशा जागने वाले का योग सिद्ध होता है।
श्लोक ६.१७
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥१७॥
अनुवाद: जो यथायोग्य (नियमित) आहार और विहार करने वाला है, कर्मों में जिसकी चेष्टाएँ नियमित हैं, और जो सोने तथा जागने में भी नियम का पालन करने वाला है, उसका वह योग सभी दुखों को नष्ट करने वाला होता है।
श्लोक ६.१८
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥१८॥
अनुवाद: जब भली-भांति वश में किया हुआ चित्त परमात्मा में ही स्थिर हो जाता है, और वह पुरुष संपूर्ण कामनाओं से सर्वथा निःस्पृह हो जाता है, तब वह “युक्त” (योगयुक्त) कहा जाता है।
श्लोक ६.१९
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥१९॥
अनुवाद: वायु रहित स्थान में रखे हुए दीपक की लौ जिस प्रकार हिलती नहीं है, वैसी ही उपमा मन को वश में रखने वाले उस योगी के चित्त की कही गई है जो अपनी आत्मा में योग साधना करता है।
श्लोक ६.२०
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥२०॥
अनुवाद: योग के अभ्यास से रोके हुए चित्त द्वारा जहाँ मनुष्य उपराम (शांत) हो जाता है, और जहाँ वह अपनी आत्मा से आत्मा को देखता हुआ अपनी आत्मा में ही संतुष्ट रहता है…
श्लोक ६.२१
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥२१॥
अनुवाद: इंद्रियों से अतीत, केवल सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनंत आनंद है, उसे जिस अवस्था में वह अनुभव करता है, और तत्व से कभी विचलित नहीं होता…
श्लोक ६.२२
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥२२॥
अनुवाद: जिसे प्राप्त करके वह उससे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं मानता, और जिस अवस्था में स्थित होकर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।
श्लोक ६.२३
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥२३॥
अनुवाद: दुखों के संयोग से रहित हुई इस अवस्था का नाम “योग” है। उस योग को बिना किसी खिन्नता या उद्वेग के दृढ़तापूर्वक अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक ६.२४
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥२४॥
अनुवाद: संकल्प से उत्पन्न होने वाली संपूर्ण कामनाओं को पूरी तरह त्यागकर, और मन के द्वारा इंद्रियों के समूह को सब ओर से अच्छी तरह नियंत्रित करके…
श्लोक ६.२५
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥२५॥
अनुवाद: धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा धीरे-धीरे उपराम (शांत) हो जाए, और मन को आत्मा में ही स्थित करके अन्य किसी वस्तु का चिंतन न करे।
श्लोक ६.२६
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥२६॥
अनुवाद: यह चंचल और स्थिर न रहने वाला मन जिस-जिस कारण से संसार की ओर भागे, उस-उस से इसे रोककर बार-बार अपनी आत्मा के ही वश में करना चाहिए।
श्लोक ६.२७
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥२७॥
अनुवाद: क्योंकि जिसका मन पूरी तरह शांत है, जिसके रजोगुण शांत हो गए हैं, जो पाप रहित है और ब्रह्म स्वरूप हो गया है, ऐसे इस उत्तम योगी को सुख प्राप्त होता है।
श्लोक ६.२८
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥२८॥
अनुवाद: पापों से रहित योगी निरंतर इस प्रकार आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ आसानी से परब्रह्म के स्पर्श से उत्पन्न होने वाले अनंत सुख का अनुभव करता है।
श्लोक ६.२९
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥२९॥
अनुवाद: योग से युक्त अंतःकरण वाला और सब जगह समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को संपूर्ण भूतों में स्थित और संपूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है।
श्लोक ६.३०
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥३०॥
अनुवाद: जो पुरुष मुझे सब जगह देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी ओझल नहीं होता और वह मेरे लिए कभी ओझल नहीं होता।
श्लोक ६.३१
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥३१॥
अनुवाद: जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर संपूर्ण भूतों में स्थित मुझ परमात्मा का भजन करता है, वह सब प्रकार से आचरण करता हुआ भी मुझमें ही निवास करता है।
श्लोक ६.३२
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥३२॥
अनुवाद: हे अर्जुन! जो योगी अपनी ही भाँति संपूर्ण भूतों में समभाव से देखता है – चाहे सुख हो या दुख – वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
श्लोक ६.३३
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥३३॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! आपने जो यह समभाव रूप योग कहा है, मन के चंचल होने के कारण मैं इसकी स्थिर स्थिति को नहीं देखता हूँ।
श्लोक ६.३४
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥३४॥
अनुवाद: क्योंकि हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमाथी (मथ डालने वाला), बलवान और दृढ़ है। इसका वश में करना मैं वायु को रोकने के समान अत्यंत कठिन मानता हूँ।
श्लोक ६.३५
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥३५॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे महाबाहो! इसमें कोई संदेह नहीं कि मन चंचल और कठिनाई से वश में होने वाला है। किंतु हे कुन्तीपुत्र! इसे निरंतर अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जाता है।
श्लोक ६.३६
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥३६॥
अनुवाद: जिसका मन वश में नहीं है, उसके लिए इस योग को प्राप्त करना कठिन है – ऐसा मेरा मत है। किंतु वश में किए हुए मन वाले और प्रयत्नशील पुरुष द्वारा यह उचित उपाय से प्राप्त किया जा सकता है।
श्लोक ६.३७
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥३७॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो योगाभ्यास में श्रद्धा तो रखता है, किंतु प्रयत्न न करने के कारण जिसका मन योग से विचलित हो गया है, और जो योग की सिद्धि को प्राप्त नहीं कर पाया, उसकी गति क्या होती है?
श्लोक ६.३८
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥३८॥
अनुवाद: हे महाबाहो! क्या वह भ्रमित मनुष्य ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग से भ्रष्ट होकर, छिन्न-भिन्न बादल की तरह दोनों ओर से नष्ट तो नहीं हो जाता?
श्लोक ६.३९
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥३९॥
अनुवाद: हे कृष्ण! मेरे इस संशय को पूरी तरह दूर करने के लिए आप ही योग्य हैं। आपके सिवा इस संशय को मिटाने वाला दूसरा कोई नहीं मिल सकता।
श्लोक ६.४०
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥४०॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में। हे प्रिय! कल्याणकारी कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक ६.४१
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥४१॥
अनुवाद: योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त करके, वहाँ अनन्त वर्षों तक निवास करने के बाद, पवित्र आचरण वाले श्रीमानों के घर में जन्म लेता है।
श्लोक ६.४२
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥४२॥
अनुवाद: अथवा वह ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है। संसार में इस प्रकार का जन्म मिलना वास्तव में अति दुर्लभ है।
श्लोक ६.४३
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥४३॥
अनुवाद: वहाँ उस पूर्व जन्म के बुद्धि-संयोग को वह पुन: प्राप्त कर लेता है, और हे कुरुनन्दन! इसके बाद वह पूर्ण सिद्धि के लिए और अधिक प्रयत्न करता है।
श्लोक ६.४४
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥
अनुवाद: वह पूर्व जन्म के अभ्यास के बल से ही विवश होकर भी ईश्वर की ओर आकर्षित होता है। योग की जिज्ञासा रखने वाला मनुष्य भी वेदों के सकाम कर्मों से परे चला जाता है।
श्लोक ६.४५
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥४५॥
अनुवाद: किंतु दृढ़ प्रयत्न करने वाला योगी पिछले सभी पापों से पूरी तरह शुद्ध होकर, अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध होकर परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक ६.४६
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६॥
अनुवाद: योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तुम योगी बनो।
श्लोक ६.४७
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥४७॥
अनुवाद: सभी योगियों में भी जो श्रद्धावान् पुरुष मुझमें लगे हुए अंतःकरण से मेरा निरंतर भजन करता है, वह योगी मुझे सबसे श्रेष्ठ (युक्ततम) मान्य है।