Shrimad Bhagavad Gita (Hindi)
अध्याय १: अर्जुनविषादयोग
Arjuna Vishada Yoga
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श्लोक १.१
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥
अनुवाद: धृतराष्ट्र ने कहा: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
श्लोक १.२
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥२॥
अनुवाद: संजय ने कहा: उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचना युक्त पाण्डवों की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।
श्लोक १.३
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥
अनुवाद: हे आचार्य! पाण्डुपुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसकी व्यूह-रचना आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपद-पुत्र (धृष्टद्युम्न) ने की है।
श्लोक १.४
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥
अनुवाद: इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि, विराट और महारथी राजा द्रुपद हैं।
श्लोक १.५
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः ॥५॥
अनुवाद: धृष्टकेतु, चेकितान, बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य हैं।
श्लोक १.६
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥६॥
अनुवाद: पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) और द्रौपदी के पुत्र – ये सभी महारथी हैं।
श्लोक १.७
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥७॥
अनुवाद: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हमारे पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उन्हें आप समझ लें। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो नायक हैं, उनके नाम मैं आपको बताता हूँ।
श्लोक १.८
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥८॥
अनुवाद: आप (द्रोणाचार्य), पितामह भीष्म, कर्ण और युद्ध विजयी कृपाचार्य, तथा अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र (भूरिश्रवा) हैं।
श्लोक १.९
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥९॥
अनुवाद: और भी बहुत से शूरवीर हैं, जिन्होंने मेरे लिए अपने जीवन की आशा त्याग दी है। वे सभी अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित हैं और युद्धकला में अत्यंत निपुण हैं।
श्लोक १.१०
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥१०॥
अनुवाद: पितामह भीष्म द्वारा रक्षित हमारी वह सेना असीमित है, जबकि भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की सेना सीमित है।
श्लोक १.११
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥११॥
अनुवाद: इसलिए आप सभी लोग मोर्चों पर अपने-अपने स्थानों में स्थित रहते हुए, सब ओर से पितामह भीष्म की ही रक्षा करें।
श्लोक १.१२
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥१२॥
अनुवाद: कौरवों में सबसे वृद्ध और प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए, सिंह की दहाड़ के समान जोर से गरजकर शंख बजाया।
श्लोक १.१३
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥१३॥
अनुवाद: उसके पश्चात शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंघे एक साथ ही बज उठे। वह शब्द बड़ा भयंकर था।
श्लोक १.१४
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४॥
अनुवाद: इसके बाद, सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाए।
श्लोक १.१५
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५॥
अनुवाद: श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया और भयंकर कर्म करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।
श्लोक १.१६
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१६॥
अनुवाद: कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया, और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए।
श्लोक १.१७
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥१७॥
अनुवाद: हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट और अजेय सात्यकि…
श्लोक १.१८
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥१८॥
अनुवाद: हे पृथ्वीपते! द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, और महाबाहु सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) – इन सभी ने सब ओर से अपने-अपने शंख बजाए।
श्लोक १.१९
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥१९॥
अनुवाद: उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को गुंजाते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) के हृदयों को विदीर्ण कर दिया।
श्लोक १.२०
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥२०॥
अनुवाद: हे राजन्! इसके बाद, अर्जुन, जिनके रथ की ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान थे, ने कौरवों को मोर्चों पर डटे हुए देखकर और शस्त्र चलने की तैयारी के समय अपना धनुष उठाकर श्रीकृष्ण से यह वचन कहा।
श्लोक १.२१–२२
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥२१॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे अच्युत (श्रीकृष्ण)! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए, ताकि मैं युद्ध की अभिलाषा से यहाँ एकत्र हुए इन लोगों को देख सकूँ कि इस युद्ध-व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।
श्लोक १.२३
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥२३॥
अनुवाद: दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में भला चाहने वाले जो-जो राजा लोग यहाँ इस सेना में आए हैं, युद्ध करने को उत्सुक उन सबको मैं देखूंगा।
श्लोक १.२४
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥
अनुवाद: संजय ने कहा: हे भरतवंशी (धृतराष्ट्र)! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस उत्तम रथ को खड़ा करके…
श्लोक १.२५
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥२५॥
अनुवाद: भीष्म, द्रोणाचार्य और सम्पूर्ण राजाओं के सामने कहा: हे पार्थ! यहाँ इकट्ठे हुए इन कुरुवंशियों को देखो।
श्लोक १.२६
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥२६॥
अनुवाद: तब पृथापुत्र (अर्जुन) ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को देखा।
श्लोक १.२७
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥२७॥
अनुवाद: दोनों सेनाओं में स्थित ससुरों को और सुहृदों (शुभचिन्तकों) को भी देखा। उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धु-बान्धवों को देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन…
श्लोक १.२८
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥२८॥
अनुवाद: अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले। अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से यहाँ उपस्थित इन स्वजनों को देखकर…
श्लोक १.२९
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥२९॥
अनुवाद: मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है; मेरे शरीर में कम्पन हो रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
श्लोक १.३०
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥३०॥
अनुवाद: हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है। मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है, और मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हूँ।
श्लोक १.३१
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥३१॥
अनुवाद: हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत देख रहा हूँ, और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर कोई कल्याण भी नहीं देखता।
श्लोक १.३२
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥३२॥
अनुवाद: हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य और न ही सुखों को। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से, भोगों से अथवा जीवन से भी क्या लाभ है?
श्लोक १.३३
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥३३॥
अनुवाद: जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे ही अपने प्राणों और धनों की आशा त्यागकर इस युद्ध में खड़े हैं।
श्लोक १.३४
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४॥
अनुवाद: गुरुजन, ताऊ-चाचे, पुत्र और उसी प्रकार दादे, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य सम्बन्धी यहाँ हैं।
श्लोक १.३५
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥३५॥
अनुवाद: हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी, अथवा त्रिलोकी के राज्य के लिए भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या!
श्लोक १.३६
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥३६॥
अनुवाद: हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से हमें पाप ही लगेगा।
श्लोक १.३७
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥३७॥
अनुवाद: इसलिए, हे माधव! अपने बन्धु-बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए योग्य नहीं है। अपने ही कुटुम्बियों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?
श्लोक १.३८
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥
अनुवाद: यद्यपि लोभ से भ्रष्ट चित्त वाले ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से द्रोह करने में पाप को नहीं देखते।
श्लोक १.३९
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
अनुवाद: किन्तु हे जनार्दन! कुल के नाश से होने वाले दोष को स्पष्ट देखने वाले हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?
श्लोक १.४०
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
अनुवाद: कुल का नाश होने पर सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं; धर्म के नष्ट हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप (अधर्म) बहुत फैल जाता है।
श्लोक १.४१
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥४१॥
अनुवाद: हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं; और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
श्लोक १.४२
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥४२॥
अनुवाद: वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। श्राद्ध और तर्पण की क्रियाओं से वंचित होकर इनके पितर भी गिर जाते हैं।
श्लोक १.४३
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥४३॥
अनुवाद: वर्णसंकर पैदा करने वाले इन कुलघातकों के इन दोषों से सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक १.४४
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥
अनुवाद: हे जनार्दन! जिनके कुल-धर्म नष्ट हो गए हैं, ऐसे मनुष्यों का निश्चित रूप से नरक में वास होता है, ऐसा हमने सुना है।
श्लोक १.४५
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥
अनुवाद: अहो! यह बड़े खेद की बात है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिए तैयार हो गए हैं।
श्लोक १.४६
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥४६॥
अनुवाद: यदि शस्त्र रहित और सामना न करने वाले मुझे, हाथों में शस्त्र लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मार भी डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
श्लोक १.४७
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥४७॥
अनुवाद: संजय ने कहा: युद्धभूमि में इस प्रकार कहकर, शोक से संतप्त मन वाले अर्जुन बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए।
अध्याय २: सांख्ययोग
Sankhya Yoga
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श्लोक २.१
सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥१॥
अनुवाद: संजय ने कहा: इस प्रकार करुणा से घिरे हुए, आंसुओं से भरे व्याकुल नेत्रों वाले और शोक करते हुए उस (अर्जुन) से मधुसूदन (श्रीकृष्ण) ने ये शब्द कहे।
श्लोक २.२
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे अर्जुन! इस संकट के समय में तुम्हारे भीतर यह अज्ञान (मोह) कहाँ से आ गया? यह श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण के योग्य नहीं है, न ही यह स्वर्ग देने वाला है और न ही कीर्ति प्रदान करने वाला है।
श्लोक २.३
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥३॥
अनुवाद: हे पार्थ! कायरता को प्राप्त मत हो, यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है। हे परन्तप (शत्रुओं को तपाने वाले)! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
श्लोक २.४
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥४॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! हे शत्रुओं के नाशक! मैं युद्धभूमि में भीष्म और द्रोण जैसे पूजनीय पुरुषों पर बाणों से कैसे प्रहार करूँगा?
श्लोक २.५
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५॥
अनुवाद: महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस संसार में भीख मांगकर खाना भी मैं अधिक श्रेयस्कर मानता हूँ। क्योंकि गुरुजनों को मारकर इस लोक में खून से सने हुए धन और कामनाओं रूपी भोगों को ही तो भोगूंगा।
श्लोक २.६
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्-
तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥६॥
अनुवाद: हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है – उन्हें जीतना या उनके द्वारा हार जाना। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़े हैं।
श्लोक २.७
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥७॥
अनुवाद: कायरता रूपी दोष के कारण नष्ट हुए स्वभाव वाला और धर्म के विषय में भ्रमित मन वाला मैं आपसे पूछता हूँ। जो मेरे लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताएँ। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, कृपया मुझे शिक्षा दें।
श्लोक २.८
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८॥
अनुवाद: क्योंकि भूमि पर बिना शत्रुओं का धन-धान्य से संपन्न राज्य और देवताओं का स्वामीपन प्राप्त कर लेने पर भी, मैं ऐसा कुछ नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।
श्लोक २.९
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥९॥
अनुवाद: संजय ने कहा: शत्रुओं को तपाने वाले गुडाकेश (अर्जुन) ने अन्तर्यामी श्रीकृष्ण से ऐसा कहकर, “हे गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा“, यह स्पष्ट रूप से कहा और चुप हो गए।
श्लोक २.१०
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥१०॥
अनुवाद: हे भरतवंशी (धृतराष्ट्र)! तब दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन से श्रीकृष्ण ने मानो मुस्कुराते हुए ये वचन कहे।
श्लोक २.११
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥११॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और फिर ज्ञानियों की तरह बातें भी करते हो। ज्ञानी जन उनके लिए शोक नहीं करते जिनके प्राण चले गए हैं, और उनके लिए भी नहीं जिनके प्राण नहीं गए हैं।
श्लोक २.१२
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥१२॥
अनुवाद: ऐसा कभी नहीं था कि मैं किसी समय में नहीं था, या तुम नहीं थे, या ये सभी राजा नहीं थे; और ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे।
श्लोक २.१३
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥१३॥
अनुवाद: जैसे इस देह में देहधारी आत्मा को बचपन, जवानी और बुढ़ापा प्राप्त होता है, वैसे ही मृत्यु के बाद उसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है। धीर पुरुष इस विषय में मोहग्रस्त नहीं होते।
श्लोक २.१४
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥१४॥
अनुवाद: हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों के विषयों से होने वाले सम्पर्क सर्दी, गर्मी, सुख और दुख देने वाले हैं। वे उत्पत्ति और विनाश वाले तथा अनित्य हैं। हे भरतवंशी! तुम उन्हें सहन करना सीखो।
श्लोक २.१५
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥१५॥
अनुवाद: हे पुरुषोत्तम! जो धीर मनुष्य सुख और दुख में समान रहता है और इन इन्द्रिय विषयों से विचलित नहीं होता, वह निश्चित ही मोक्ष (अमरता) के योग्य हो जाता है।
श्लोक २.१६
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६॥
अनुवाद: असत् (जो अस्थायी है) का कोई अस्तित्व नहीं है, और सत् (जो शाश्वत है) का कभी अभाव नहीं होता। सत्य को जानने वालों ने इन दोनों के वास्तविक स्वरूप का भली-भांति दर्शन किया है।
श्लोक २.१७
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥१७॥
अनुवाद: उसे तुम अविनाशी जानो जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है। इस नष्ट न होने वाले तत्व का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
श्लोक २.१८
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥१८॥
अनुवाद: इस अविनाशी, अप्रमेय और नित्य आत्मा के ये भौतिक शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए, हे भरतवंशी! तुम युद्ध करो।
श्लोक २.१९
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥१९॥
अनुवाद: जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है, और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं; क्योंकि यह आत्मा न तो किसी को मारता है और न ही मारा जाता है।
श्लोक २.२०
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२०॥
अनुवाद: यह आत्मा किसी भी काल में न तो जन्म लेता है और न ही मरता है। न ही यह ऐसा है कि उत्पन्न होकर फिर कभी होने वाला है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
श्लोक २.२१
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१॥
अनुवाद: हे पार्थ! जो मनुष्य यह जानता है कि यह आत्मा अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय (अपरिवर्तनीय) है, वह किसी को कैसे मार सकता है या किसी को कैसे मरवा सकता है?
श्लोक २.२२
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२२॥
अनुवाद: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करती है।
श्लोक २.२३
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३॥
अनुवाद: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग इसे जला नहीं सकती, जल इसे भिगो नहीं सकता, और वायु इसे सुखा नहीं सकती।
श्लोक २.२४
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४॥
अनुवाद: यह आत्मा काटी नहीं जा सकती, जलाई नहीं जा सकती, भिगोई नहीं जा सकती और सुखाई नहीं जा सकती। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
श्लोक २.२५
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥२५॥
अनुवाद: यह आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और विकाररहित (परिवर्तन रहित) कही जाती है। इसलिए आत्मा को ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक २.२६
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥२६॥
अनुवाद: और यदि तुम इस आत्मा को सदा जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानते हो, तो भी हे महाबाहो! तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक २.२७
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२७॥
अनुवाद: क्योंकि जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मर गया है उसका जन्म निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य (जिसे टाला न जा सके) विषय पर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक २.२८
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥२८॥
अनुवाद: हे भरतवंशी! सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट (अव्यक्त) थे, जन्म और मृत्यु के बीच प्रकट (व्यक्त) रहते हैं, और मृत्यु के बाद फिर से अप्रकट हो जाते हैं। इसमें शोक करने की क्या बात है?
श्लोक २.२९
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥२९॥
अनुवाद: कोई इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है, कोई दूसरा इसका आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है, कोई अन्य इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है, और सुनकर भी कोई इसे वास्तव में समझ नहीं पाता।
श्लोक २.३०
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥३०॥
अनुवाद: हे भरतवंशी! सबके शरीर में रहने वाली यह आत्मा नित्य अवध्य है (इसे कभी मारा नहीं जा सकता)। इसलिए किसी भी प्राणी के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक २.३१
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥३१॥
अनुवाद: अपने क्षत्रिय धर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए; क्योंकि धर्म के लिए युद्ध करने से बढ़कर एक क्षत्रिय के लिए अन्य कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं है।
श्लोक २.३२
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥३२॥
अनुवाद: हे पार्थ! वे क्षत्रिय बड़े भाग्यशाली हैं जिन्हें ऐसा युद्ध अपने आप प्राप्त होता है, जो कि उनके लिए खुले हुए स्वर्ग के द्वार के समान है।
श्लोक २.३३
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥३३॥
अनुवाद: किन्तु यदि तुम इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करोगे, तो अपने धर्म और कीर्ति को खो दोगे, और तुम्हें पाप लगेगा।
श्लोक २.३४
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥३४॥
अनुवाद: लोग सदा तुम्हारी अपकीर्ति का वर्णन करेंगे, और एक सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है।
श्लोक २.३५
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥३५॥
अनुवाद: जिन महारथियों की दृष्टि में तुम बहुत सम्मानित रहे हो, वे तुम्हें तुच्छ समझेंगे और यही मानेंगे कि तुमने भय के कारण युद्ध क्षेत्र छोड़ दिया है।
श्लोक २.३६
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६॥
अनुवाद: तुम्हारे शत्रु तुम्हारी सामर्थ्य की निन्दा करते हुए तुम्हें बहुत से न कहने योग्य शब्द कहेंगे। तुम्हारे लिए इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है?
श्लोक २.३७
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥३७॥
अनुवाद: हे कुन्तीपुत्र! या तो तुम युद्ध में मारे जाकर स्वर्ग प्राप्त करोगे, या फिर विजयी होकर पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए युद्ध का दृढ़ निश्चय करके खड़े हो जाओ।
श्लोक २.३८
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥३८॥
अनुवाद: सुख और दुख, लाभ और हानि, तथा जय और पराजय को समान मानकर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। इस प्रकार युद्ध करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
श्लोक २.३९
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥३९॥
अनुवाद: हे पार्थ! यह ज्ञान मैंने तुम्हें सांख्य योग (ज्ञान योग) के अनुसार बताया है। अब तुम इसे निष्काम कर्मयोग के विषय में सुनो, जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बन्धन को पूरी तरह काट डालोगे।
श्लोक २.४०
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४०॥
अनुवाद: इस कर्मयोग में न तो आरम्भ का नाश होता है और न ही कोई विपरीत परिणाम (दोष) होता है। इस धर्म का थोड़ा सा भी अभ्यास बड़े भारी भय (जन्म-मृत्यु के चक्र) से बचा लेता है।
श्लोक २.४१
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥४१॥
अनुवाद: हे कुरुनन्दन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है; किन्तु जो अस्थिर विचार वाले विवेकरहित सकाम मनुष्य हैं, उनकी बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं।
श्लोक २.४२–४३
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥४२॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥४३॥
अनुवाद: हे पार्थ! जो अज्ञानी लोग वेदों के उन वाक्यों में प्रीति रखते हैं जो केवल सकाम कर्मों की प्रशंसा करते हैं, और जो यह कहते हैं कि इसके सिवाय और कुछ नहीं है। जो कामनाओं से भरे हुए हैं और स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानते हैं, वे लोग भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए जन्म-मरण रूपी फल देने वाली अनेक प्रकार की सकाम क्रियाओं का वर्णन करने वाली दिखावटी (पुष्पित) बातें करते हैं।
श्लोक २.४४
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥४४॥
अनुवाद: उन दिखावटी बातों द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, ऐसे मनुष्यों की परमात्मा में एकनिष्ठ (निश्चयात्मक) बुद्धि नहीं होती।
श्लोक २.४५
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥
अनुवाद: हे अर्जुन! वेद मुख्य रूप से प्रकृति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) के कार्यरूप संसार का वर्णन करने वाले हैं। तुम इन तीनों गुणों से ऊपर उठो, सुख-दुख आदि द्वन्द्वों से रहित हो जाओ, नित्य सत्त्वगुण में स्थित रहो, योग-क्षेम (अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा) की चिन्ता से मुक्त और आत्मपरायण बनो।
श्लोक २.४६
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥४६॥
अनुवाद: सब ओर से परिपूर्ण विशाल जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे कुएँ का जितना उपयोग रह जाता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ज्ञानी ब्राह्मण के लिए समस्त वेदों का भी उतना ही उपयोग रह जाता है।
श्लोक २.४७
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥४७॥
अनुवाद: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मों के फल का कारण मत बनो, और कर्म न करने (अकर्मण्यता) में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
श्लोक २.४८
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥
अनुवाद: हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (विफलता) में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म करो। यह समत्व भाव ही ‘योग’ कहलाता है।
श्लोक २.४९
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥४९॥
अनुवाद: हे धनञ्जय! समत्व बुद्धि योग की तुलना में सकाम कर्म अत्यन्त निम्न श्रेणी का है। इसलिए तुम समबुद्धि (निष्काम भाव) की शरण ग्रहण करो। फल की इच्छा से कर्म करने वाले लोग अत्यन्त कृपण (दयनीय) हैं।
श्लोक २.५०
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥५०॥
अनुवाद: समबुद्धि युक्त पुरुष इसी संसार में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है (अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है)। इसलिए तुम समत्व रूपी योग में लग जाओ। कर्मों में कुशलता ही योग है।
श्लोक २.५१
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥५१॥
अनुवाद: क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानी जन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्म-मरण रूपी बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और उस परम निर्विकार परमपद को प्राप्त कर लेते हैं।
श्लोक २.५२
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥५२॥
अनुवाद: जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूपी दलदल को पूरी तरह पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य (इस लोक और परलोक के) सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाओगे।
श्लोक २.५३
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥
अनुवाद: अनेक प्रकार के वचनों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि जब परमात्मा के ध्यान (समाधि) में स्थिर और अचल हो जाएगी, तब तुम योग (परमात्मा से मिलन) को प्राप्त करोगे।
श्लोक २.५४
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥५४॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे केशव! समाधि में स्थित, स्थिर बुद्धि वाले (स्थितप्रज्ञ) पुरुष के क्या लक्षण हैं? वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
श्लोक २.५५
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! जब मनुष्य मन में उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूरी तरह त्याग देता है और अपनी आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह ‘स्थितप्रज्ञ’ (स्थिर बुद्धि वाला) कहा जाता है।
श्लोक २.५६
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥
अनुवाद: दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जिसकी कोई लालसा नहीं रहती, और जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से पूर्णतः मुक्त हो गया है, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि वाला (स्थितप्रज्ञ) कहा जाता है।
श्लोक २.५७
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५७॥
अनुवाद: जो पुरुष सर्वत्र आसक्ति रहित होता है, और उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त करके न तो प्रसन्न होता है और न ही द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।
श्लोक २.५८
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८॥
अनुवाद: और जिस प्रकार कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार जब यह मनुष्य इन्द्रियों के विषयों से अपनी इन्द्रियों को पूरी तरह खींच लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
श्लोक २.५९
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥५९॥
अनुवाद: इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति (रस) बनी रहती है। लेकिन परम तत्त्व (परमात्मा) का साक्षात्कार कर लेने पर इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की वह आसक्ति भी निवृत्त हो जाती है।
श्लोक २.६०
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥६०॥
अनुवाद: हे कुन्तीपुत्र! क्योंकि ये इन्द्रियाँ इतनी प्रमथनशील (बलवान) हैं कि ये यत्न करते हुए विवेकशील पुरुष के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं।
श्लोक २.६१
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६१॥
अनुवाद: उन समस्त इन्द्रियों को वश में करके, योगी को चाहिए कि वह मुझमें ही मन लगाकर मत्पर (मेरे परायण) होकर बैठे। क्योंकि जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
श्लोक २.६२
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥६२॥
अनुवाद: विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है, आसक्ति से कामना (इच्छा) पैदा होती है, और कामना में बाधा आने से क्रोध उत्पन्न होता है।
श्लोक २.६३
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥६३॥
अनुवाद: क्रोध से अत्यंत मोह (विभ्रम) उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति भ्रमित होने से बुद्धि का नाश हो जाता है, और बुद्धि का नाश होने से वह मनुष्य खुद नष्ट हो जाता है।
श्लोक २.६४
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥६४॥
अनुवाद: किंतु अपने अधीन की हुई इन्द्रियों द्वारा, राग और द्वेष से रहित होकर विषयों में विचरण करने वाला मनुष्य अंतःकरण की प्रसन्नता (प्रसाद) को प्राप्त होता है।
श्लोक २.६५
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥६५॥
अनुवाद: अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर उस मनुष्य के सम्पूर्ण दुखों का नाश हो जाता है; और प्रसन्न चित्त वाले ऐसे मनुष्य की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से स्थिर हो जाती है।
श्लोक २.६६
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥६६॥
अनुवाद: जो योग से युक्त नहीं है (जिसकी बुद्धि स्थिर नहीं है), उसकी निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती; और उस अयुक्त मनुष्य के अंतःकरण में भावना (शांति) भी नहीं होती। शान्ति रहित मनुष्य को सुख कहाँ से मिल सकता है?
श्लोक २.६७
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥६७॥
अनुवाद: जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु बहा ले जाती है, वैसे ही विचरण करने वाली इन्द्रियों में से जिसके साथ मन लगा रहता है, वह मन उस मनुष्य की स्थिर बुद्धि को हर लेता है।
श्लोक २.६८
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८॥
अनुवाद: इसलिए हे महाबाहो! जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार से वश में की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।
श्लोक २.६९
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥६९॥
अनुवाद: जो सब जीवों के लिए रात्रि (अंधकार स्वरूप या अज्ञात) है, उस परमतत्व में संयमी पुरुष जागता है; और जिस संसार में सब जीव जागते हैं, वह तत्वदर्शी मुनि के लिए रात्रि के समान (उपेक्षा के योग्य) है।
श्लोक २.७०
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥
अनुवाद: जैसे दोनों ओर से जल के आने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा में स्थिर रहता है और अडिग रहता है, वैसे ही सब कामनाएँ जिस मनुष्य में बिना विकार के प्रवेश करती हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों की कामना करने वाला नहीं।
श्लोक २.७१
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥७१॥
अनुवाद: जो मनुष्य समस्त कामनाओं को त्यागकर, ममता रहित, अहंकार रहित और निःस्पृह होकर विचरण करता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है।
श्लोक २.७२
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥७२॥
अनुवाद: हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति (ब्रह्म को प्राप्त स्थिति) है। इसे प्राप्त होकर मनुष्य कभी मोह को नहीं प्राप्त होता। अंतकाल में भी इस स्थिति में स्थित होकर वह ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।
अध्याय ३: कर्मयोग
Karma Yoga
श्लोक पर जाएँ: १ · २ · ३ · ४ · ५ · ६ · ७ · ८ · ९ · १० · ११ · १२ · १३ · १४ · १५ · १६ · १७ · १८ · १९ · २० · २१ · २२ · २३ · २४ · २५ · २६ · २७ · २८ · २९ · ३० · ३१ · ३२ · ३३ · ३४ · ३५ · ३६ · ३७ · ३८ · ३९ · ४० · ४१ · ४२ · ४३
श्लोक ३.१
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे जनार्दन! यदि आपकी यह मान्यता है कि बुद्धि, सकाम कर्म से श्रेष्ठ है, तो फिर हे केशव! आप मुझे इस घोर कर्म (युद्ध) में क्यों लगा रहे हैं?
श्लोक ३.२
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥२॥
अनुवाद: आप मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए, जिससे मैं परम कल्याण (श्रेय) को प्राप्त कर सकूँ।
श्लोक ३.३
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥३॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे अनघ (पापरहित अर्जुन)! इस संसार में निष्ठा दो प्रकार की है, जो मैंने पहले कही थी – ज्ञानियों के लिए ज्ञानयोग द्वारा, और योगियों के लिए कर्मयोग द्वारा।
श्लोक ३.४
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥४॥
अनुवाद: मनुष्य न तो कर्मों को आरंभ किए बिना निष्कर्मता (सिद्धि) को प्राप्त होता है, और न ही कर्मों के केवल त्याग मात्र से पूर्ण सिद्धि को प्राप्त कर पाता है।
श्लोक ३.५
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥५॥
अनुवाद: कोई भी मनुष्य क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; क्योंकि प्रकृति के गुणों (सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण) द्वारा विवश होकर सभी प्राणी कर्म करते हैं।
श्लोक ३.६
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥६॥
अनुवाद: जो मूर्ख मनुष्य समस्त इन्द्रियों को ऊपर से रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है।
श्लोक ३.७
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥७॥
अनुवाद: किंतु हे अर्जुन! जो मनुष्य मन द्वारा इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति रहित होकर समस्त कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।
श्लोक ३.८
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥८॥
अनुवाद: तुम अपने नियत कर्तव्य का पालन करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तुम्हारे शरीर का निर्वाह (शरीर-यात्रा) भी सिद्ध नहीं हो सकता।
श्लोक ३.९
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥९॥
अनुवाद: यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के अलावा इस संसार में अन्य सभी कर्मों से मनुष्य कर्म-बंधन में बंध जाता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! आसक्ति से मुक्त होकर यज्ञ के लिए ही भली-भांति कर्म करो।
श्लोक ३.१०
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१०॥
अनुवाद: प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आरंभ में प्रजा को रचकर उनसे कहा था: “तुम इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम्हें तुम्हारी सभी कामनाओं को पूरा करने वाला (कामधुक्) हो।”
श्लोक ३.११
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥११॥
अनुवाद: इस यज्ञ के द्वारा तुम देवताओं की उन्नति करो और वे देवता तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे की उन्नति करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त होओगे।
श्लोक ३.१२
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥१२॥
अनुवाद: यज्ञ द्वारा संवर्धित देवता तुम्हें बिना माँगे ही इष्ट भोग प्रदान करेंगे। जो पुरुष देवताओं द्वारा दिए गए इन भोगों को स्वयं उपभोग करता है, किंतु उन्हें अर्पित नहीं करता, वह चोर ही है।
श्लोक ३.१३
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥१३॥
अनुवाद: यज्ञ से बचे हुए अन्न को (यज्ञशेष को) खाने वाले श्रेष्ठ संत पुरुष सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं; किंतु जो पापी लोग केवल अपने शरीर के पोषण के लिए भोजन पकाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं।
श्लोक ३.१४
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥१४॥
अनुवाद: सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा यज्ञ से होती है, और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होता है।
श्लोक ३.१५
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥
अनुवाद: कर्म को वेद से उत्पन्न जानो, और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न जानो। इसीलिए सर्वव्यापी परम ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित रहता है।
श्लोक ३.१६
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥१६॥
अनुवाद: हे पार्थ! जो मनुष्य इस संसार में इस प्रकार चलाए गए सृष्टि चक्र के अनुकूल नहीं चलता, वह पाप-आयु वाला, इन्द्रियों के परायण और व्यर्थ में ही जीने वाला है।
श्लोक ३.१७
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥१७॥
अनुवाद: किंतु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही पूरी तरह संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।
श्लोक ३.१८
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥
अनुवाद: उस महापुरुष के लिए इस संसार में किए गए कर्म से कोई प्रयोजन नहीं रहता और न ही कर्म न करने से कोई हानि होती है। संपूर्ण प्राणियों में भी उसका ऐसा कोई स्वार्थी संबंध नहीं होता।
श्लोक ३.१९
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥१९॥
अनुवाद: इसलिए तुम निरंतर आसक्ति से रहित होकर अपने कर्तव्य कर्म का अच्छी तरह आचरण करो; क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करने वाला मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक ३.२०
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥२०॥
अनुवाद: जनक आदि राजा लोग भी आसक्ति रहित होकर केवल कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिए लोकसंग्रह को देखते हुए भी तुम्हें कर्म करना ही चाहिए।
श्लोक ३.२१
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥२१॥
अनुवाद: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य भी वैसा ही आचरण करते हैं; वह जो कुछ प्रमाण (आदर्श) प्रस्तुत करता है, समस्त संसार उसका अनुसरण करता है।
श्लोक ३.२२
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥२२॥
अनुवाद: हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरे लिए कुछ भी कर्तव्य नहीं है, और न ही कोई ऐसी प्राप्त करने योग्य वस्तु है जिसे मैंने प्राप्त न किया हो; फिर भी मैं कर्म में ही वर्तता हूँ (कर्म करता हूँ)।
श्लोक ३.२३
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥२३॥
अनुवाद: क्योंकि हे पार्थ! यदि मैं कभी सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ, तो मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करेंगे।
श्लोक ३.२४
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥
अनुवाद: यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब लोक नष्ट-भ्रष्ट हो जाएंगे; और मैं वर्णसंकर को उत्पन्न करने वाला तथा इस प्रजा का नाश करने वाला बन जाऊँगा।
श्लोक ३.२५
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥२५॥
अनुवाद: हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानी जन जैसे कर्म करते हैं, आसक्ति रहित होकर ज्ञानी पुरुष भी लोकसंग्रह करना चाहते हुए वैसे ही कर्म करें।
श्लोक ३.२६
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥२६॥
अनुवाद: ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम (भेद) पैदा न करे, बल्कि स्वयं योगयुक्त होकर सभी कर्मों को अच्छी प्रकार से करते हुए उनसे भी वैसे ही करवाए।
श्लोक ३.२७
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥२७॥
अनुवाद: संपूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, किंतु जिसका मन अहंकार से मोहित हो गया है, वह “मैं कर्ता हूँ” ऐसा मानता है।
श्लोक ३.२८
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥२८॥
अनुवाद: किंतु हे महाबाहो! गुण और कर्मों के विभाग को जानने वाला तत्वज्ञ पुरुष यह अच्छी तरह जानता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, इसलिए वह उनमें आसक्त नहीं होता।
श्लोक ३.२९
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥२९॥
अनुवाद: प्रकृति के गुणों से पूरी तरह मोहित हुए मनुष्य गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन पूर्ण ज्ञान न रखने वाले मंदबुद्धियों को, सब कुछ जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे।
श्लोक ३.३०
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥३०॥
अनुवाद: संपूर्ण कर्मों को मुझमें समर्पित करके, अध्यात्म-युक्त चित्त से, कामना रहित और ममता से मुक्त होकर तथा संताप (चिंता) को त्यागकर तुम युद्ध करो।
श्लोक ३.३१
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥३१॥
अनुवाद: जो मनुष्य दोष-दृष्टि से रहित होकर और श्रद्धा से युक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी संपूर्ण कर्मों के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक ३.३२
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥३२॥
अनुवाद: किंतु जो मनुष्य मेरे इस मत में दोष निकालते हैं और इसका अनुसरण नहीं करते, उन्हें संपूर्ण ज्ञान से मोहित, विवेकहीन और नष्ट हुआ ही समझो।
श्लोक ३.३३
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥३३॥
अनुवाद: ज्ञानी मनुष्य भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही आचरण करता है। सभी प्राणी प्रकृति के ही अधीन हैं, ऐसी स्थिति में हठ (निग्रह) क्या कर सकता है?
श्लोक ३.३४
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥३४॥
अनुवाद: प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे दोनों इसके कल्याण के मार्ग में शत्रु (परिपन्थी) हैं।
श्लोक ३.३५
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥३५॥
अनुवाद: अच्छी प्रकार से आचरण किए गए दूसरे के धर्म (परधर्म) की अपेक्षा अपना धर्म (स्वधर्म), भले ही गुणों से रहित हो, श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, जबकि दूसरे का धर्म भय पैदा करने वाला है।
श्लोक ३.३६
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥३६॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे वार्ष्णेय! फिर यह मनुष्य न चाहते हुए भी, बलपूर्वक लगाए हुए की तरह, किससे प्रेरित होकर इस पाप का आचरण करता है?
श्लोक ३.३७
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥३७॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: यह काम (इच्छा) ही है, यह क्रोध ही है, जो रजोगुण से उत्पन्न हुआ है। यह बहुत खाने वाला (अतृप्त रहने वाला) और महापापी है; इसे ही तुम इस संसार में वैरी (शत्रु) जानो।
श्लोक ३.३८
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥३८॥
अनुवाद: जैसे धुएँ से अग्नि, मैल से दर्पण, और जेर (गर्भ की झिल्ली) से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही इस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका हुआ है।
श्लोक ३.३९
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥३९॥
अनुवाद: हे कुन्तीपुत्र! इस कभी न संतुष्ट होने वाले और काम रूपी अग्नि से, जो ज्ञानियों का नित्य शत्रु है, यह विवेक ज्ञान ढका हुआ है।
श्लोक ३.४०
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥४०॥
अनुवाद: इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि – ये सभी इस काम के रहने के स्थान कहे जाते हैं। यह काम इन सबके द्वारा ही ज्ञान को ढँककर इस देहधारी जीव को मोहित करता है।
श्लोक ३.४१
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥४१॥
अनुवाद: इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! तुम सबसे पहले इन्द्रियों को वश में करके, इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महापापी काम रूपी शत्रु को अवश्य ही बलपूर्वक मार डालो।
श्लोक ३.४२
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥४२॥
अनुवाद: इन्द्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ (सूक्ष्म) कही जाती हैं, इन्द्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह यह आत्मा (परमात्मा) है।
श्लोक ३.४३
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥४३॥
अनुवाद: इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर और अपने द्वारा अपने मन को नियंत्रित करके, हे महाबाहो! इस दुर्जय काम रूपी शत्रु को मार गिराओ।
अध्याय ४: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Jnana Karma Sannyasa Yoga
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श्लोक ४.१
श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: मैंने इस अविनाशी योग को सूर्यदेव विवस्वान से कहा था, विवस्वान ने मनु से कहा, और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।
श्लोक ४.२
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥२॥
अनुवाद: हे परन्तप (अर्जुन)! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना था, किंतु वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी पर लुप्त हो गया है।
श्लोक ४.३
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥
अनुवाद: वही यह पुरातन योग आज मैंने तुमसे कहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और प्रिय सखा हो, और यह अत्यंत उत्तम रहस्य है।
श्लोक ४.४
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: सूर्यदेव विवस्वान का जन्म तो आपसे बहुत पहले हुआ था, फिर मैं यह कैसे समझूँ कि आपने कल्प के आरंभ में उनका उपदेश किया था?
श्लोक ४.५
श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥५॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, किंतु हे परन्तप! तुम उनको नहीं जानते।
श्लोक ४.६
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥६॥
अनुवाद: यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप वाला हूँ तथा सभी प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
श्लोक ४.७
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
अनुवाद: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ (प्रकट होता हूँ)।
श्लोक ४.८
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
अनुवाद: साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए, और धर्म की अच्छी तरह स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
श्लोक ४.९
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥
अनुवाद: हे अर्जुन! मेरे इस प्रकार के जन्म और कर्म दिव्य हैं जो मनुष्य इस प्रकार तत्व से जान लेता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे ही प्राप्त होता है।
श्लोक ४.१०
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥१०॥
अनुवाद: जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए हैं, जो मुझमें ही तन्मय (लीन) हैं, जो मेरी ही शरण में हैं और ज्ञान रूपी तप से पवित्र हुए ऐसे अनेक पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
श्लोक ४.११
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥११॥
अनुवाद: हे पार्थ! जो मनुष्य जिस प्रकार मेरी शरण ग्रहण करते हैं, मैं उनको उसी के अनुरूप भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
श्लोक ४.१२
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥१२॥
अनुवाद: इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि मनुष्यों को कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र प्राप्त होती है।
श्लोक ४.१३
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥१३॥
अनुवाद: मनुष्य के गुण और कर्मों के विभाग के अनुसार चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की रचना मेरे द्वारा की गई है। यद्यपि मैं उसका रचयिता हूँ, तथापि मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।
श्लोक ४.१४
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥१४॥
अनुवाद: कर्मों के फल में मेरी कोई स्पृहा (इच्छा) नहीं है, इसलिए कर्म मुझे लिप्त नहीं करते। जो मनुष्य मुझे इस प्रकार तत्व से जानता है, वह भी कर्मों के बंधनों से नहीं बंधता।
श्लोक ४.१५
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥१५॥
अनुवाद: पूर्वकाल के मुमुक्षु पुरुषों ने भी ऐसा ही जानकर कर्म किया है। इसलिए तुम भी पूर्वकाल के पुरखों द्वारा किए गए कर्मों को ही करो।
श्लोक ४.१६
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥१६॥
अनुवाद: कर्म क्या है और अकर्म क्या है – इस विषय में ज्ञानी पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म तुम्हें अच्छी प्रकार कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे।
श्लोक ४.१७
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥१७॥
अनुवाद: कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, निषेध कर्म (विकर्म) का स्वरूप भी जानना चाहिए, और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति अत्यंत गहन है।
श्लोक ४.१८
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥१८॥
अनुवाद: जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है; वह योगी और संपूर्ण कर्मों को करने वाला है।
श्लोक ४.१९
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥१९॥
अनुवाद: जिसके संपूर्ण आरंभ (कर्म) कामना और संकल्प से रहित होते हैं, तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञान रूपी अग्नि से भस्म हो गए हैं, ऐसे पुरुष को ज्ञानी जन पंडित कहते हैं।
श्लोक ४.२०
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥२०॥
अनुवाद: कर्मों के फल में आसक्ति का त्याग करके, जो सदा तृप्त रहता है और किसी पर भी आश्रित नहीं रहता, वह कर्मों में अच्छी तरह प्रवृत्त होने पर भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
श्लोक ४.२१
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥२१॥
अनुवाद: जिसकी आशा और चित्त वश में हैं, जिसने संपूर्ण संग्रह का त्याग कर दिया है, ऐसा शरीर मात्र से कर्म करने वाला मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक ४.२२
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥२२॥
अनुवाद: जो बिना माँगे अपने आप प्राप्त हुए लाभ से संतुष्ट रहता है, जो द्वन्द्वों से अतीत है, ईर्ष्या रहित है, तथा सिद्धि और असिद्धि में समान रहता है, वह कर्म करते हुए भी बन्धनों में नहीं बंधता।
श्लोक ४.२३
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥२३॥
अनुवाद: जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो मुक्त हो चुका है, और जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, ऐसा यज्ञ के लिए कर्म करने वाले मनुष्य का संपूर्ण कर्म विलीन हो जाता है।
श्लोक ४.२४
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥२४॥
अनुवाद: जिसके द्वारा आहुति दी जाती है वह अर्पण (कड़छी आदि) ब्रह्म है, हवि (घृत आदि) ब्रह्म है, ब्रह्म रूपी अग्नि में ब्रह्म रूपी कर्ता द्वारा जो आहुति दी जाती है वह भी ब्रह्म है – इस प्रकार ब्रह्म कर्म में समाधिस्थ हुए पुरुष द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य गंतव्य भी ब्रह्म ही है।
श्लोक ४.२५
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥२५॥
अनुवाद: कुछ योगी जन देवताओं की पूजा रूप यज्ञ का ही भली-भांति अनुष्ठान करते हैं, और अन्य योगी जन परब्रह्म रूपी अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ की आहुति देते हैं।
श्लोक ४.२६
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥२६॥
अनुवाद: कुछ अन्य योगी जन श्रोत्र आदि सभी इन्द्रियों को संयम रूपी अग्नियों में होम करते हैं, और दूसरे लोग शब्दादि विषयों को इन्द्रियों रूपी अग्नि में होम करते हैं।
श्लोक ४.२७
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥२७॥
अनुवाद: कुछ अन्य लोग इन्द्रियों के संपूर्ण कर्मों और प्राणों के संपूर्ण कर्मों को ज्ञान से प्रदीप्त आत्म-संयम रूप योग की अग्नि में होम करते हैं।
श्लोक ४.२८
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥२८॥
अनुवाद: इसी प्रकार कुछ लोग द्रव्य-संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कुछ तपस्या रूप यज्ञ वाले हैं, कुछ योग रूप यज्ञ वाले हैं, और तीखे व्रतों वाले यति जन स्वाध्याय और ज्ञान रूप यज्ञ करने वाले हैं।
श्लोक ४.२९
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥२९॥
अनुवाद: अन्य प्राणायाम परायण लोग प्राण (श्वास) में अपान को, तथा अपान में प्राण को होम करते हैं; इस प्रकार प्राण और अपान दोनों की गति को रोककर प्राणायाम में तत्पर रहते हैं।
श्लोक ४.३०
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥३०॥
अनुवाद: अन्य नियमित आहार करने वाले लोग प्राणों को प्राणों में ही होम करते हैं। ये सभी यज्ञों को जानने वाले और यज्ञों द्वारा अपने पापों को नष्ट करने वाले होते हैं।
श्लोक ४.३१
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥३१॥
अनुवाद: हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ के परिणाम स्वरूप बचे हुए अमृत (यज्ञशेष) का अनुभव करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वाले मनुष्य के लिए यह लोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक तो कैसे होगा?
श्लोक ४.३२
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥३२॥
अनुवाद: इस प्रकार वेदों के मुख (विस्तार) में अनेक प्रकार के यज्ञ विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तुम कर्म से उत्पन्न हुआ जानो। ऐसा जानकर तुम (संसार बंधन से) पूरी तरह मुक्त हो जाओगे।
श्लोक ४.३३
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥
अनुवाद: हे परन्तप (अर्जुन)! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान यज्ञ सर्वथा श्रेष्ठ है। हे पार्थ! संपूर्ण कर्म ज्ञान में ही समाप्त (परिपूर्ण) हो जाते हैं।
श्लोक ४.३४
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥३४॥
अनुवाद: उस ज्ञान को तुम तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझो – उन्हें दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से, और कपट छोड़कर सरल भाव से प्रश्न करने से वे ज्ञानी महात्मा तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश करेंगे।
श्लोक ४.३५
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥३५॥
अनुवाद: हे पाण्डव! जिसे जानकर तुम फिर कभी ऐसे मोह को प्राप्त नहीं होगे, और जिसके द्वारा तुम संपूर्ण भूतों को पहले अपनी आत्मा में और तब मुझ परमात्मा में देखोगे।
श्लोक ४.३६
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥३६॥
अनुवाद: यदि तुम संपूर्ण पापियों से भी अधिक पापी हो, तो भी तुम इस ज्ञान रूपी नौका के द्वारा ही संपूर्ण पाप-समुद्र को अच्छी तरह पार कर जाओगे।
श्लोक ४.३७
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥३७॥
अनुवाद: हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन (लकड़ी) को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि संपूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है।
श्लोक ४.३८
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥३८॥
अनुवाद: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला वास्तव में कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को जो योग में भली-भांति सिद्ध हो चुका है, वह मनुष्य स्वयं ही कालान्तर में अपनी आत्मा में पा लेता है।
श्लोक ४.३९
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥३९॥
अनुवाद: श्रद्धा से युक्त, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला और अपनी साधना में तत्पर रहने वाला मनुष्य ज्ञान को प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक ४.४०
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥४०॥
अनुवाद: विवेकहीन, श्रद्धाहीन और संशययुक्त आत्मा वाला मनुष्य नष्ट हो जाता है। संशययुक्त मनुष्य के लिए न तो यह लोक है, न परलोक, और न ही कोई सुख है।
श्लोक ४.४१
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥४१॥
अनुवाद: हे धनंजय! जिसने योग के द्वारा अपने कर्मों का समर्पण कर दिया है, ज्ञान के द्वारा जिसके सारे संशय छिन्न-भिन्न हो गए हैं, और जो अपने स्वरूप में स्थित (आत्मवान) है, ऐसे पुरुष को कर्म नहीं बांधते।
श्लोक ४.४२
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥४२॥
अनुवाद: इसलिए हे भारत (अर्जुन)! तुम्हारे हृदय में अज्ञान से उत्पन्न जो यह संशय स्थित है, उसे ज्ञान रूपी तलवार से काटकर अलग कर दो, और योग में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ!
अध्याय ५: कर्मसंन्यासयोग
Karma Sannyasa Yoga
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श्लोक ५.१
अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर योग (कर्मयोग) की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से जो एक मेरे लिए अति कल्याणकारी हो, उसे निश्चित करके कहिए।
श्लोक ५.२
श्रीभगवानुवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥२॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: संन्यास (कर्मों का त्याग) और कर्मयोग – ये दोनों ही परम कल्याण को देने वाले हैं। किंतु उन दोनों में भी कर्मों के संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।
श्लोक ५.३
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥३॥
अनुवाद: हे महाबाहो! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि राग-द्वेष आदि द्वन्द्वों से रहित मनुष्य सुखपूर्वक बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक ५.४
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥४॥
अनुवाद: सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग को अज्ञानी जन अलग-अलग कहते हैं, न कि ज्ञानी। इनमें से एक में भी अच्छी तरह स्थित हुआ पुरुष दोनों के फल को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक ५.५
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥
अनुवाद: ज्ञानयोगियों द्वारा जो स्थान प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही स्थान प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को एक रूप में देखता है, वही वास्तव में देखता है।
श्लोक ५.६
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥६॥
अनुवाद: किंतु हे महाबाहो! बिना कर्मयोग के संन्यास प्राप्त करना कठिन है। योगयुक्त मननशील मुनि ब्रह्म को शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।
श्लोक ५.७
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥७॥
अनुवाद: जो कर्मयोग से युक्त है, जिसका अंतःकरण शुद्ध है, जिसने अपने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है, और जो संपूर्ण प्राणियों की आत्मा ही अपनी आत्मा है, ऐसा पुरुष कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।
श्लोक ५.८–९
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥८॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥९॥
अनुवाद: तत्व को जानने वाला योगयुक्त पुरुष देखता, सुनता, स्पर्श करता, सूंघता, भोजन करता, चलता, सोता, श्वास लेता हुआ… बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते और बंद करते हुए भी यही मानता है कि “मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ,” बल्कि इन्द्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।
श्लोक ५.१०
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥१०॥
अनुवाद: जो पुरुष संपूर्ण कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पाप से ऐसे सुरक्षित रहता है जैसे कमल का पत्ता जल से अप्रभावित रहता है।
श्लोक ५.११
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥११॥
अनुवाद: योगी जन केवल शरीर से, मन से, बुद्धि से और इन्द्रियों द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।
श्लोक ५.१२
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥१२॥
अनुवाद: कर्मयोग से युक्त पुरुष कर्मों के फल का त्याग करके नैष्ठिकी (भगवत्प्राप्ति रूपी) शांति को प्राप्त होता है, जबकि जो अयुक्त है (जो योग से रहित है) वह कामना के कारण फल में आसक्त होकर बंध जाता है।
श्लोक ५.१३
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥१३॥
अनुवाद: सब कर्मों को मन से त्यागकर, वश में करने वाला वह देही पुरुष नौ द्वारों वाले इस शरीर रूपी नगर में न तो कुछ करते हुए और न ही किसी से कुछ करवाते हुए सुखपूर्वक आनंद से रहता है।
श्लोक ५.१४
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥१४॥
अनुवाद: परमेश्वर न तो किसी के कर्तृत्व की, न कर्मों की और न ही कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं। यह सब तो प्रकृति का स्वभाव ही प्रवृत्त होता है।
श्लोक ५.१५
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥
अनुवाद: परमेश्वर न तो किसी के पाप कर्म को और न ही किसी के पुण्य कर्म को ग्रहण करते हैं। अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है, जिससे सब जीव मोहित होते हैं।
श्लोक ५.१६
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥१६॥
अनुवाद: किंतु जिनका वह अज्ञान आत्मज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के समान उस परमतत्व को प्रकाशित कर देता है।
श्लोक ५.१७
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥१७॥
अनुवाद: जिनका मन उसी में स्थित है, जिनकी बुद्धि उसी रूप हो रही है, और जिनका परम आश्रय वही परमतत्व है, ऐसे ज्ञान द्वारा जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, वे पुरुष अपुनरावृत्ति (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।
श्लोक ५.१८
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥१८॥
अनुवाद: ज्ञानी जन विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चांडाल में भी समान रूप से देखने वाले (समदर्शी) होते हैं।
श्लोक ५.१९
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥१९॥
अनुवाद: जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इसी जीवित अवस्था में संपूर्ण संसार जीत लिया गया है। निर्दोष और सम होने के कारण वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
श्लोक ५.२०
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥२०॥
अनुवाद: जो प्रिय वस्तु को पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय को पाकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिर बुद्धि वाला, संशय रहित और ब्रह्म को जानने वाला पुरुष ब्रह्म में ही स्थित रहता है।
श्लोक ५.२१
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥२१॥
अनुवाद: बाहर के विषयों में आसक्ति से रहित अंतःकरण वाला पुरुष जो आत्मिक सुख प्राप्त करता है, वह ब्रह्मयोग से युक्त अंतःकरण वाला पुरुष अक्षय सुख का अनुभव करता है।
श्लोक ५.२२
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥२२॥
अनुवाद: विषयों और इंद्रियों के संयोग से उत्पन्न होने वाले जितने भी भोग हैं, वे सभी दुखों के कारण हैं और आदि-अंत वाले (नाशवान) हैं। हे कुन्तीपुत्र! ज्ञानी पुरुष उनमें रमण नहीं करता।
श्लोक ५.२३
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥२३॥
अनुवाद: जो मनुष्य इस शरीर के छूटने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही इस संसार में सुखी है।
श्लोक ५.२४
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥२४॥
अनुवाद: जो पुरुष अंतःकरण में ही सुख पाने वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है, और जो अंतःकरण में ही प्रकाश (ज्ञान) वाला है, वह योगी ब्रह्मभूत होकर शांत ब्रह्म (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
श्लोक ५.२५
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥२५॥
अनुवाद: जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके संशय छिन्न-भिन्न हो गए हैं, जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है, और जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, ऐसे ऋषि ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होते हैं।
श्लोक ५.२६
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥२६॥
अनुवाद: काम और क्रोध से रहित, जीते हुए मन वाले, और आत्म-स्वरूप को जानने वाले संन्यासी पुरुषों के लिए सब ओर से ब्रह्म-निर्वाण सुरक्षित है।
श्लोक ५.२७–२८
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥२७॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥२८॥
अनुवाद: बाहर के विषयों को बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच में स्थित करके, तथा नासिका में बहने वाले प्राण और अपान वायु को समान करके, जो मुनि अपनी इंद्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लेता है तथा इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा मुक्त हो जाता है, वह मोक्षपरायण पुरुष सदा मुक्त ही है।
श्लोक ५.२९
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥२९॥
अनुवाद: मुझे संपूर्ण यज्ञों और तपों का भोगने वाला, संपूर्ण लोकों का महान ईश्वर, और सभी भूतों का सुहृद (मित्र) जानकर, मेरा भक्त शांति को प्राप्त होता है।
अध्याय ६: आत्मसंयमयोग
Atma Samyama Yoga
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श्लोक ६.१
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है; न तो अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी है और न ही केवल कर्मों को छोड़ने वाला अक्रिय व्यक्ति।
श्लोक ६.२
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥२॥
अनुवाद: हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को तू योग जान; क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी मनुष्य योगी नहीं हो सकता।
श्लोक ६.३
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥३॥
अनुवाद: योग पर आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील मुनि के लिए कर्म ही साधन कहा जाता है, और जब वह योग पर आरूढ़ हो जाता है, तब शम (मन की शांति और कर्मों से उपरामता) ही उसका साधन कहा जाता है।
श्लोक ६.४
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥४॥
अनुवाद: जब मनुष्य न तो इंद्रियों के विषयों में और न ही कर्मों में आसक्त होता है, तथा संपूर्ण संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह “योगारूढ़” (योग में स्थित) कहा जाता है।
श्लोक ६.५
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥५॥
अनुवाद: मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी आत्मा के द्वारा अपना उद्धार करे, और अपने को नीचे न गिराए (पतन न होने दे); क्योंकि यह मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।
श्लोक ६.६
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६॥
अनुवाद: जिस मनुष्य ने अपनी आत्मा को अपने द्वारा जीत लिया है, उसकी आत्मा ही उसकी मित्र है; किंतु जिसने आत्मा को नहीं जीता है, उसकी आत्मा शत्रु के समान शत्रुता करती है।
श्लोक ६.७
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥७॥
अनुवाद: जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो शांत चित्त है, उसकी परमात्मा में पूर्ण रूप से स्थिति है – ठंड और गर्मी, सुख और दुख, तथा मान और अपमान में उसका चित्त समान रहता है।
श्लोक ६.८
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥८॥
अनुवाद: जिसका अंतःकरण ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो विकार रहित और विजितेन्द्रिय है, तथा जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण एक समान हैं, वह योगी “युक्त” (सिद्ध) कहा जाता है।
श्लोक ६.९
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥
अनुवाद: सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, और बंधुओं में, तथा साधुओं और पापियों में भी जो समान बुद्धि रखता है, वह पुरुष विशेष रूप से श्रेष्ठ है।
श्लोक ६.१०
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१०॥
अनुवाद: योगी को चाहिए कि वह एकांत स्थान में स्थित रहकर, अकेले ही मन और शरीर को वश में करते हुए, तथा आशा और संग्रह से रहित होकर निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाए।
श्लोक ६.११
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥११॥
अनुवाद: पवित्र स्थान में, जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा, जिस पर क्रमशः कुश, मृगचर्म और वस्त्र बिछे हों, ऐसा अपना स्थिर आसन स्थापित करे।
श्लोक ६.१२
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥१२॥
अनुवाद: उस आसन पर बैठकर, मन और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, चित्त को एकाग्र करके अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
श्लोक ६.१३
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥१३॥
अनुवाद: शरीर, सिर और गर्दन को समान (सीधा) तथा अचल और स्थिर रखते हुए, अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर टिकाकर और इधर-उधर न देखते हुए…
श्लोक ६.१४
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥१४॥
अनुवाद: शांत अंतःकरण वाला, भय से रहित, ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, मन को पूरी तरह संयम में रखकर मुझमें चित्त लगाने वाला और मेरे परायण होकर आसन पर बैठे।
श्लोक ६.१५
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥१५॥
अनुवाद: मन को वश में रखने वाला योगी निरंतर इस प्रकार आत्मा को मुझमें लगाता हुआ, मेरे स्वरूप में स्थित रहने वाली परम शांति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
श्लोक ६.१६
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥१६॥
अनुवाद: हे अर्जुन! न तो बहुत खाने वाले का योग सिद्ध होता है, और न ही बिल्कुल न खाने वाले (फाका करने वाले) का; न ही बहुत सोने वाले का और न ही हमेशा जागने वाले का योग सिद्ध होता है।
श्लोक ६.१७
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥१७॥
अनुवाद: जो यथायोग्य (नियमित) आहार और विहार करने वाला है, कर्मों में जिसकी चेष्टाएँ नियमित हैं, और जो सोने तथा जागने में भी नियम का पालन करने वाला है, उसका वह योग सभी दुखों को नष्ट करने वाला होता है।
श्लोक ६.१८
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥१८॥
अनुवाद: जब भली-भांति वश में किया हुआ चित्त परमात्मा में ही स्थिर हो जाता है, और वह पुरुष संपूर्ण कामनाओं से सर्वथा निःस्पृह हो जाता है, तब वह “युक्त” (योगयुक्त) कहा जाता है।
श्लोक ६.१९
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥१९॥
अनुवाद: वायु रहित स्थान में रखे हुए दीपक की लौ जिस प्रकार हिलती नहीं है, वैसी ही उपमा मन को वश में रखने वाले उस योगी के चित्त की कही गई है जो अपनी आत्मा में योग साधना करता है।
श्लोक ६.२०
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥२०॥
अनुवाद: योग के अभ्यास से रोके हुए चित्त द्वारा जहाँ मनुष्य उपराम (शांत) हो जाता है, और जहाँ वह अपनी आत्मा से आत्मा को देखता हुआ अपनी आत्मा में ही संतुष्ट रहता है…
श्लोक ६.२१
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥२१॥
अनुवाद: इंद्रियों से अतीत, केवल सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनंत आनंद है, उसे जिस अवस्था में वह अनुभव करता है, और तत्व से कभी विचलित नहीं होता…
श्लोक ६.२२
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥२२॥
अनुवाद: जिसे प्राप्त करके वह उससे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं मानता, और जिस अवस्था में स्थित होकर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।
श्लोक ६.२३
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥२३॥
अनुवाद: दुखों के संयोग से रहित हुई इस अवस्था का नाम “योग” है। उस योग को बिना किसी खिन्नता या उद्वेग के दृढ़तापूर्वक अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक ६.२४
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥२४॥
अनुवाद: संकल्प से उत्पन्न होने वाली संपूर्ण कामनाओं को पूरी तरह त्यागकर, और मन के द्वारा इंद्रियों के समूह को सब ओर से अच्छी तरह नियंत्रित करके…
श्लोक ६.२५
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥२५॥
अनुवाद: धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा धीरे-धीरे उपराम (शांत) हो जाए, और मन को आत्मा में ही स्थित करके अन्य किसी वस्तु का चिंतन न करे।
श्लोक ६.२६
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥२६॥
अनुवाद: यह चंचल और स्थिर न रहने वाला मन जिस-जिस कारण से संसार की ओर भागे, उस-उस से इसे रोककर बार-बार अपनी आत्मा के ही वश में करना चाहिए।
श्लोक ६.२७
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥२७॥
अनुवाद: क्योंकि जिसका मन पूरी तरह शांत है, जिसके रजोगुण शांत हो गए हैं, जो पाप रहित है और ब्रह्म स्वरूप हो गया है, ऐसे इस उत्तम योगी को सुख प्राप्त होता है।
श्लोक ६.२८
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥२८॥
अनुवाद: पापों से रहित योगी निरंतर इस प्रकार आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ आसानी से परब्रह्म के स्पर्श से उत्पन्न होने वाले अनंत सुख का अनुभव करता है।
श्लोक ६.२९
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥२९॥
अनुवाद: योग से युक्त अंतःकरण वाला और सब जगह समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को संपूर्ण भूतों में स्थित और संपूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है।
श्लोक ६.३०
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥३०॥
अनुवाद: जो पुरुष मुझे सब जगह देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी ओझल नहीं होता और वह मेरे लिए कभी ओझल नहीं होता।
श्लोक ६.३१
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥३१॥
अनुवाद: जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर संपूर्ण भूतों में स्थित मुझ परमात्मा का भजन करता है, वह सब प्रकार से आचरण करता हुआ भी मुझमें ही निवास करता है।
श्लोक ६.३२
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥३२॥
अनुवाद: हे अर्जुन! जो योगी अपनी ही भाँति संपूर्ण भूतों में समभाव से देखता है – चाहे सुख हो या दुख – वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
श्लोक ६.३३
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥३३॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! आपने जो यह समभाव रूप योग कहा है, मन के चंचल होने के कारण मैं इसकी स्थिर स्थिति को नहीं देखता हूँ।
श्लोक ६.३४
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥३४॥
अनुवाद: क्योंकि हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमाथी (मथ डालने वाला), बलवान और दृढ़ है। इसका वश में करना मैं वायु को रोकने के समान अत्यंत कठिन मानता हूँ।
श्लोक ६.३५
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥३५॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे महाबाहो! इसमें कोई संदेह नहीं कि मन चंचल और कठिनाई से वश में होने वाला है। किंतु हे कुन्तीपुत्र! इसे निरंतर अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जाता है।
श्लोक ६.३६
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥३६॥
अनुवाद: जिसका मन वश में नहीं है, उसके लिए इस योग को प्राप्त करना कठिन है – ऐसा मेरा मत है। किंतु वश में किए हुए मन वाले और प्रयत्नशील पुरुष द्वारा यह उचित उपाय से प्राप्त किया जा सकता है।
श्लोक ६.३७
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥३७॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो योगाभ्यास में श्रद्धा तो रखता है, किंतु प्रयत्न न करने के कारण जिसका मन योग से विचलित हो गया है, और जो योग की सिद्धि को प्राप्त नहीं कर पाया, उसकी गति क्या होती है?
श्लोक ६.३८
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥३८॥
अनुवाद: हे महाबाहो! क्या वह भ्रमित मनुष्य ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग से भ्रष्ट होकर, छिन्न-भिन्न बादल की तरह दोनों ओर से नष्ट तो नहीं हो जाता?
श्लोक ६.३९
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥३९॥
अनुवाद: हे कृष्ण! मेरे इस संशय को पूरी तरह दूर करने के लिए आप ही योग्य हैं। आपके सिवा इस संशय को मिटाने वाला दूसरा कोई नहीं मिल सकता।
श्लोक ६.४०
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥४०॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में। हे प्रिय! कल्याणकारी कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक ६.४१
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥४१॥
अनुवाद: योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त करके, वहाँ अनन्त वर्षों तक निवास करने के बाद, पवित्र आचरण वाले श्रीमानों के घर में जन्म लेता है।
श्लोक ६.४२
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥४२॥
अनुवाद: अथवा वह ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है। संसार में इस प्रकार का जन्म मिलना वास्तव में अति दुर्लभ है।
श्लोक ६.४३
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥४३॥
अनुवाद: वहाँ उस पूर्व जन्म के बुद्धि-संयोग को वह पुन: प्राप्त कर लेता है, और हे कुरुनन्दन! इसके बाद वह पूर्ण सिद्धि के लिए और अधिक प्रयत्न करता है।
श्लोक ६.४४
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥
अनुवाद: वह पूर्व जन्म के अभ्यास के बल से ही विवश होकर भी ईश्वर की ओर आकर्षित होता है। योग की जिज्ञासा रखने वाला मनुष्य भी वेदों के सकाम कर्मों से परे चला जाता है।
श्लोक ६.४५
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥४५॥
अनुवाद: किंतु दृढ़ प्रयत्न करने वाला योगी पिछले सभी पापों से पूरी तरह शुद्ध होकर, अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध होकर परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक ६.४६
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६॥
अनुवाद: योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तुम योगी बनो।
श्लोक ६.४७
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥४७॥
अनुवाद: सभी योगियों में भी जो श्रद्धावान् पुरुष मुझमें लगे हुए अंतःकरण से मेरा निरंतर भजन करता है, वह योगी मुझे सबसे श्रेष्ठ (युक्ततम) मान्य है।
अध्याय ७: ज्ञानविज्ञानयोग
Jnana Vijnana Yoga
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श्लोक ७.१
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! मुझमें आसक्त मन, मेरे परायण होकर और योग का अभ्यास करते हुए, तू जिस प्रकार संपूर्ण रूप से बिना किसी संदेह के मुझे जानेगा, उसे सुन।
श्लोक ७.२
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥२॥
अनुवाद: मैं तेरे लिए इस ज्ञान को और विज्ञान को पूरी तरह कहूँगा, जिसे जानकर इस संसार में फिर दूसरा कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहता।
श्लोक ७.३
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥३॥
अनुवाद: हजारों मनुष्यों में कोई एक ही सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है, और उन प्रयत्न करने वाले योगियों में भी कोई विरला ही मुझे तत्व से जानता है।
श्लोक ७.४
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥४॥
अनुवाद: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – इस प्रकार यह मेरी आठ प्रकार से बंटी हुई अपरा (जड़) प्रकृति है।
श्लोक ७.५
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥५॥
अनुवाद: हे महाबाहो! इससे दूसरी को मेरी परा (चेतन) प्रकृति जान, जो जीव रूप है और जिससे यह संपूर्ण जगत धारण किया जाता है।
श्लोक ७.६
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥६॥
अनुवाद: तू ऐसा जान कि संपूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं। मैं ही संपूर्ण जगत का प्रभव (उत्पत्ति का कारण) और प्रलय (विनाश का कारण) हूँ।
श्लोक ७.७
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥७॥
अनुवाद: हे धनंजय! मुझसे परे दूसरा कोई भी श्रेष्ठ तत्व नहीं है। यह संपूर्ण जगत सूत्र में मणियों के समूह की तरह मुझमें ही पिरोया हुआ है।
श्लोक ७.८
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥८॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! मैं जल में रस हूँ, चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश (प्रभा) हूँ, समस्त वेदों में ॐकार हूँ, आकाश में शब्द हूँ, और मनुष्यों में पुरुषार्थ (पौरुष) हूँ।
श्लोक ७.९
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥९॥
अनुवाद: मैं पृथ्वी में पवित्र गंध हूँ और अग्नि में तेज हूँ। संपूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।
श्लोक ७.१०
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥१०॥
अनुवाद: हे पार्थ! तू मुझे संपूर्ण भूतों का सनातन बीज जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।
श्लोक ७.११
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥११॥
अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामना से रहित बल हूँ, और सभी भूतों में शास्त्र के अनुकूल काम (धर्मानुकूल इच्छा) हूँ।
श्लोक ७.१२
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥१२॥
अनुवाद: और जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सभी मुझसे ही उत्पन्न होते हैं – ऐसा तू जान। वास्तव में मैं उनमें नहीं हूँ, बल्कि वे मुझमें हैं।
श्लोक ७.१३
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥१३॥
अनुवाद: प्रकृति के इन तीन गुणों (सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण) से रचे गए इन भावों से यह सारा संसार मोहित होकर इन गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता।
श्लोक ७.१४
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥१४॥
अनुवाद: मेरी यह त्रिगुणमयी अलौकिक माया अत्यंत कठिनता से पार करने योग्य है। जो पुरुष केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वे इस माया को लाँघ जाते हैं।
श्लोक ७.१५
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥१५॥
अनुवाद: माया द्वारा जिनका ज्ञान छीना जा चुका है, ऐसे आसुरी स्वभाव को धारण करने वाले, मनुष्यों में नीच और मूर्ख पापकर्मी लोग मेरी शरण नहीं लेते।
श्लोक ७.१६
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥१६॥
अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले चार प्रकार के भक्त मेरा भजन करते हैं – आर्त (दुखी), जिज्ञासु (जानने की इच्छा रखने वाला), अर्थार्थी (धन चाहने वाला), और ज्ञानी (तत्वज्ञ)।
श्लोक ७.१७
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥१७॥
अनुवाद: उनमें से निरंतर मुझमें जुड़ा हुआ, एक ही भक्ति में दृढ़ ज्ञानी भक्त सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि मुझे जानने वाले ज्ञानी को मैं अतिशय प्रिय हूँ और वह मुझे अति प्रिय है।
श्लोक ७.१८
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥१८॥
अनुवाद: ये सभी भक्त उदार हैं, किंतु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है – ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह स्थिर मन वाला ज्ञानी भक्त मुझ उत्तम गति को ही प्राप्त है।
श्लोक ७.१९
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥१९॥
अनुवाद: अनेक जन्मों के अंत के जन्म में तत्व को जानने वाला ज्ञानी “सब कुछ वासुदेव (परमात्मा) ही हैं” – इस प्रकार मुझको भजता है। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक ७.२०
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥२०॥
अनुवाद: जिनकी बुद्धि कामनाओं द्वारा हर ली गई है, वे अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं।
श्लोक ७.२१
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥२१॥
अनुवाद: जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, मैं उसी भक्त की श्रद्धा को उस देवता के प्रति स्थिर करता हूँ।
श्लोक ७.२२
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥२२॥
अनुवाद: वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की पूजा करता है, और उस देवता से अपनी मनचाही कामनाओं को प्राप्त करता है – यद्यपि वे सभी भोग वास्तव में मेरे द्वारा ही विहित (उत्पादित) होते हैं।
श्लोक ७.२३
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥२३॥
अनुवाद: किंतु उन अल्प बुद्धि वाले लोगों का वह फल नाशवान होता है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, और मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक ७.२४
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥२४॥
अनुवाद: बुद्धिहीन मनुष्य मेरे अनुत्तम, अविनाशी और परम भाव को न जानते हुए, मुझ सच्चिदानंदघन को अप्रकट से प्रकट हुआ (मानव रूप में जन्मा साधारण मनुष्य) मानते हैं।
श्लोक ७.२५
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥२५॥
अनुवाद: अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष प्रकट नहीं होता। इसलिए यह अज्ञानी संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।
श्लोक ७.२६
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥२६॥
अनुवाद: हे अर्जुन! मैं भूतकाल में हो चुके, वर्तमान में मौजूद और भविष्य में होने वाले सभी प्राणियों को जानता हूँ, किंतु मुझे कोई भी नहीं जानता।
श्लोक ७.२७
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥२७॥
अनुवाद: हे भरतवंशी अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न होने वाले सुख-दुख रूपी द्वन्द्व-मोह से सभी प्राणी अज्ञान को प्राप्त हो रहे हैं।
श्लोक ७.२८
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥२८॥
अनुवाद: किंतु जिन निष्कलंक पुण्यकर्म वाले मनुष्यों के पाप नष्ट हो चुके हैं, वे द्वन्द्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़ व्रत के साथ मेरा भजन करते हैं।
श्लोक ७.२९
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥२९॥
अनुवाद: जो जरा (बुढ़ापा) और मरण (मृत्यु) से मुक्ति पाने के लिए मेरी शरण लेकर यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, संपूर्ण अध्यात्म को और संपूर्ण कर्म को भली-भांति जानते हैं।
श्लोक ७.३०
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥३०॥
अनुवाद: जो पुरुष अधिभूत, अधिदैव और यज्ञ सहित संपूर्ण रूप से मुझे जानते हैं, वे युक्त चित्त वाले पुरुष अंत समय में भी मुझे अच्छी तरह जानते हैं।
अध्याय ८: अक्षरब्रह्मयोग
Akshara Brahma Yoga
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श्लोक ८.१
अर्जुन उवाच
किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहा गया है? और अधिदैव क्या कहलाता है?
श्लोक ८.२
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥२॥
अनुवाद: हे मधुसूदन! इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और वह कैसे है? तथा मृत्यु के समय (प्रयाणकाल) वश में किए हुए अंतःकरण वाले पुरुषों द्वारा आप किस प्रकार जानने योग्य हैं?
श्लोक ८.३
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥३॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: वह परम अविनाशी तत्व ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वभाव (आत्मा) ‘अध्यात्म’ कहलाता है, और प्राणियों के उत्पन्न होने का कारण जो यज्ञ रूपी त्याग (विसर्ग) है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है।
श्लोक ८.४
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥४॥
अनुवाद: हे शरीरधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! नाशवान वस्तुएँ ‘अधिभूत’ हैं, हिरण्यगर्भ (ब्रह्म) ‘अधिदैवत’ है, और इस शरीर में मैं स्वयं ‘अधियज्ञ’ हूँ।
श्लोक ८.५
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥५॥
अनुवाद: जो पुरुष अंतकाल में भी मेरा ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है – इसमें कोई संदेह नहीं है।
श्लोक ८.६
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥६॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह सदा उसी भाव से भावित होने के कारण उसी को प्राप्त होता है।
श्लोक ८.७
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ॥७॥
अनुवाद: इसलिए तू हर समय मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मुझमें मन और बुद्धि को अर्पित करके तू निःसंशय मुझे ही प्राप्त होगा।
श्लोक ८.८
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥८॥
अनुवाद: हे पार्थ! अभ्यास रूप योग से युक्त, अन्यत्र न जाने वाले स्थिर चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशस्वरूप दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
श्लोक ८.९
कविं पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥९॥
अनुवाद: जो सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंत्रक, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके पालनहार, अचिन्त्य रूप, सूर्य के समान प्रकाशमान और अंधकार से परे परम प्रकाशस्वरूप का निरंतर स्मरण करता है…
श्लोक ८.१०
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥१०॥
अनुवाद: वह मृत्यु के समय अचल मन से, भक्ति युक्त और योग बल से प्राणों को दोनों भौंहों के बीच में अच्छी तरह स्थापित करके, उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त होता है।
श्लोक ८.११
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥११॥
अनुवाद: वेदों के ज्ञाता जिसे ‘अक्षर’ (अविनाशी) कहते हैं, वीतराग (आसक्ति रहित) संन्यासी जिसमें प्रवेश करते हैं, और जिसे पाने की इच्छा वाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस परम पद का संक्षेप में मैं तुझे वर्णन करूँगा।
श्लोक ८.१२
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥
अनुवाद: इंद्रियों के सभी द्वारों को रोककर, मन को हृदय में अच्छी प्रकार स्थापित करके, और अपने प्राण को मस्तक में धारण करके योग-धारणा में स्थित हो जाए…
श्लोक ८.१३
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥१३॥
अनुवाद: जो पुरुष ‘ॐ’ इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक ८.१४
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥१४॥
अनुवाद: हे पार्थ! जो पुरुष मुझमें अनन्य मन लगाकर सदा ही मेरा स्मरण करता है, उस नित्य-युक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ (आसानी से प्राप्त हो जाता हूँ)।
श्लोक ८.१५
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥१५॥
अनुवाद: परम सिद्धि को प्राप्त हुए महात्मा लोग मुझको प्राप्त करके दुखों के घर और क्षणभंगुर पुनर्जन्म को फिर कभी प्राप्त नहीं होते।
श्लोक ८.१६
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥१६॥
अनुवाद: हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावर्ती (वहाँ से लौटकर आने वाले) हैं, किंतु हे कौन्तेय! मुझको प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक ८.१७
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥१७॥
अनुवाद: ब्रह्मा का एक दिन सहस्र युगों की अवधि वाला है, और उनकी रात्रि भी सहस्र युगों तक की है – इसे जो लोग जानते हैं, वे ही दिन और रात के असली तत्व को जानने वाले हैं।
श्लोक ८.१८
अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥१८॥
अनुवाद: ब्रह्मा के दिन का आगमन होने पर संपूर्ण चराचर प्राणी अव्यक्त (प्रकृति) से उत्पन्न होते हैं, और रात्रि का आगमन होने पर उसी अव्यक्त नामक प्रलय में लीन हो जाते हैं।
श्लोक ८.१९
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥१९॥
अनुवाद: वही यह प्राणियों का समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर प्रकृति के वश में होने के कारण रात्रि के आगमन पर लीन होता है और दिन के आगमन पर फिर से उत्पन्न होता है।
श्लोक ८.२०
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥२०॥
अनुवाद: उस अव्यक्त से भी परे, दूसरा जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह संपूर्ण प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
श्लोक ८.२१
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥
अनुवाद: जिसे अव्यक्त और ‘अक्षर’ कहा जाता है, उसी को परम गति कहते हैं। जिसे प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते, वह मेरा परम धाम है।
श्लोक ८.२२
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥२२॥
अनुवाद: हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सभी भूत हैं और जिससे यह संपूर्ण जगत व्याप्त है, वह परम पुरुष केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है।
श्लोक ८.२३
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥२३॥
अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! जिस काल में शरीर त्यागकर जाने पर योगीगण लौटकर न आने वाली गति को और जिस काल में जाने वाली गति को प्राप्त होते हैं, उस काल को मैं कहता हूँ।
श्लोक ८.२४
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥२४॥
अनुवाद: जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीने हैं, उस मार्ग से शरीर छोड़कर गए हुए ब्रह्म को जानने वाले योगजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
श्लोक ८.२५
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥२५॥
अनुवाद: जिस मार्ग में धूमात्मक रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने हैं, उस मार्ग से गया हुआ योगी चंद्रमा के प्रकाश को प्राप्त होकर फिर लौटकर आता है।
श्लोक ८.२६
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥२६॥
अनुवाद: संसार की ये दोनों शुक्ल (प्रकाशमयी) और कृष्ण (अंधकारमयी) गतियाँ सनातन मानी गई हैं। इनमें से एक के द्वारा जाने वाले को कभी न लौटने वाली गति मिलती है, और दूसरी के द्वारा जाने वाले को वापस लौटना पड़ता है।
श्लोक ८.२७
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७॥
अनुवाद: हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को अच्छी तरह जानने वाला कोई भी योगी कभी मोहित नहीं होता। इसलिए तू सभी काल में योगयुक्त (भक्ति और समभाव में स्थित) हो जा।
श्लोक ८.२८
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥२८॥
अनुवाद: योगी पुरुष वेदों के अध्ययन में, यज्ञों में, तपस्याओं में और दानों में जो-जो पुण्य फल कहे गए हैं, उन सबको लाँघकर उस आदि और सनातन परम स्थान को प्राप्त कर लेता है।
अध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोग
Raja Vidya Raja Guhya Yoga
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श्लोक ९.१
श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: तुझ दोष-दृष्टि से रहित भक्त के लिए इस अत्यंत गोपनीय ज्ञान को और विज्ञान सहित अनुभव को भी प्रकट रूप से कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाएगा।
श्लोक ९.२
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥२॥
अनुवाद: यह ज्ञान सभी विद्याओं का राजा और सभी गोपनीय विषयों का राजा है, अत्यंत पवित्र और उत्तम है। यह प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला, धर्मयुक्त, करने में बहुत आसान और अविनाशी है।
श्लोक ९.३
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥३॥
अनुवाद: हे परन्तप! इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे प्राप्त न होकर, मृत्यु रूपी संसार के मार्ग में ही लौट आते हैं (बार-बार जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते हैं)।
श्लोक ९.४
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥४॥
अनुवाद: यह संपूर्ण जगत मेरे अव्यक्त रूप (निराकार रूप) द्वारा व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं, किंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
श्लोक ९.५
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥५॥
अनुवाद: और वे सभी प्राणी भी मुझमें स्थित नहीं हैं – मेरी इस योग-ऐश्वर्य शक्ति को देख! प्राणियों को धारण करने वाला और प्राणियों को उत्पन्न करने वाला मेरा यह आत्मस्वरूप भूतस्थ (प्राणियों में स्थित) नहीं है।
श्लोक ९.६
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥६॥
अनुवाद: जैसे आकाश में रहने वाला महान वायु सब जगह चलते हुए भी सदा आकाश में ही स्थित रहता है, वैसे ही तू जान कि संपूर्ण भूत मुझमें ही स्थित हैं।
श्लोक ९.७
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥७॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! कल्प का अंत होने पर संपूर्ण भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं (प्रकृति में लीन होते हैं), और कल्प के आदि में मैं उनको फिर से उत्पन्न करता हूँ।
श्लोक ९.८
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥८॥
अनुवाद: अपनी प्रकृति को अपने अधीन करके, प्रकृति के बल से परवश हुए इन संपूर्ण भूत-समूह को मैं बार-बार रचता हूँ।
श्लोक ९.९
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥९॥
अनुवाद: हे धनंजय! वे कर्म मुझे नहीं बांधते, क्योंकि मैं उदासीन के समान रहता हूँ और उन कर्मों में आसक्ति से रहित हूँ।
श्लोक ९.१०
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥१०॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! मेरी अध्यक्षता में यह प्रकृति चराचर सहित संपूर्ण जगत को रचती है। इसी कारण से यह संसार बार-बार घूमता (उत्पन्न और नष्ट होता) है।
श्लोक ९.११
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥११॥
अनुवाद: मेरे परम भाव को न जानने वाले मूर्ख लोग मनुष्य रूप में प्रकट हुए मुझ संपूर्ण भूतों के महान ईश्वर को साधारण मनुष्य मानकर तुच्छ समझते हैं (अवज्ञा करते हैं)।
श्लोक ९.१२
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥१२॥
अनुवाद: वे व्यर्थ की आशाओं वाले, व्यर्थ के कर्मों वाले, और व्यर्थ के ज्ञान वाले विमूढ़ चित्त पुरुष राक्षसी और आसुरी मोहनी प्रकृति को ही धारण किए रहते हैं।
श्लोक ९.१३
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥१३॥
अनुवाद: किंतु हे पार्थ! महात्मा लोग दैवी प्रकृति के आश्रित हैं, और मुझको संपूर्ण भूतों का सनातन आदि कारण तथा अविनाशी जानकर अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।
श्लोक ९.१४
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥१४॥
अनुवाद: वे दृढ़ व्रत वाले भक्त निरंतर मेरा कीर्तन करते हुए, मेरी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हुए, और मुझे बार-बार नमस्कार करते हुए, सदा मुझमें मन लगाकर भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।
श्लोक ९.१५
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥१५॥
अनुवाद: अन्य कुछ ज्ञानी जन ज्ञान यज्ञ के द्वारा मुझ एकरूप (अद्वैत), पृथक-पृथक (विश्वरूप), और सब ओर मुख वाले विराट रूप की उपासना करते हैं।
श्लोक ९.१६
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥१६॥
अनुवाद: क्रतु (वैदिक यज्ञ) मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा (पितरों का अन्न) मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मंत्र मैं हूँ, घी मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ, और आहुति (होम) भी मैं ही हूँ।
श्लोक ९.१७
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥१७॥
अनुवाद: इस जगत का पिता, माता, पालनहार और पितामह (दादा) मैं हूँ। जानने योग्य पवित्र ॐकार, तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।
श्लोक ९.१८
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥१८॥
अनुवाद: गति, भर्ता (पोषण करने वाला), प्रभु, साक्षी, निवास स्थान, शरण देने वाला, सुहृद (मित्र), उत्पत्ति और प्रलय का स्थान, आधार, और अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।
श्लोक ९.१९
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥१९॥
अनुवाद: हे अर्जुन! मैं ही (सूर्य रूप में) तपता हूँ, वर्षा को रोकता और भेजता हूँ; अमृत और मृत्यु दोनों ही मैं हूँ, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
श्लोक ९.२०
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥२०॥
अनुवाद: तीनों वेदों को जानने वाले, सोमरस पीने वाले, और पापों से पवित्र हुए लोग यज्ञों के द्वारा मेरी पूजा करके स्वर्ग की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। वे अपने पुण्य कर्मों के फलस्वरूप इंद्रलोक को प्राप्त करके स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोगों को भोगते हैं।
श्लोक ९.२१
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥२१॥
अनुवाद: वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य क्षीण होने पर इस मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का पालन करने वाले और भोगों की कामना करने वाले बार-बार आने-जाने (आगमन-प्रस्थान) को प्राप्त होते हैं।
श्लोक ९.२२
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥२२॥
अनुवाद: जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य-युक्त पुरुषों का योग और क्षेम मैं ही वहन करता हूँ।
श्लोक ९.२३
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥२३॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! जो अन्य देवताओं के भक्त हैं और श्रद्धा से युक्त होकर पूजते हैं, वे भी विधि के विरुद्ध (अविधिपूर्वक) केवल मेरा ही पूजन करते हैं।
श्लोक ९.२४
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥२४॥
अनुवाद: क्योंकि संपूर्ण यज्ञों के भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, किंतु वे मुझे तत्व से नहीं जानते, इसलिए वे गिरते हैं (पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं)।
श्लोक ९.२५
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥२५॥
अनुवाद: देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को जाते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं, और मेरा पूजन करने वाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक ९.२६
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥२६॥
अनुवाद: जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, शुद्ध बुद्धि वाले उस भक्त के द्वारा प्रेमपूर्वक दिए गए उस भेंट को मैं स्वीकार करता हूँ।
श्लोक ९.२७
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥२७॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो यज्ञ करता है, जो दान देता है, और जो तपस्या करता है – वह सब मुझे ही अर्पण कर।
श्लोक ९.२८
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥२८॥
अनुवाद: इस प्रकार तू कर्मों के शुभ और अशुभ फलों से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा। संन्यास योग से युक्त और विमुक्त हुआ तू मुझे ही प्राप्त होगा।
श्लोक ९.२९
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९॥
अनुवाद: मैं सभी प्राणियों में समान रूप से हूँ; न कोई मेरा द्वेषी है और न प्रिय। किंतु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रकट रहता हूँ।
श्लोक ९.३०
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥३०॥
अनुवाद: यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भजन करता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए; क्योंकि उसका निश्चय पूरी तरह सही है।
श्लोक ९.३१
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥३१॥
अनुवाद: वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शांति को प्राप्त होता है। हे कौन्तेय! तू प्रतिज्ञा कर कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
श्लोक ९.३२
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥३२॥
अनुवाद: हे पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापकर्म करने वाले जो कोई भी हों, यदि वे मेरी शरण लेते हैं, वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक ९.३३
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥३३॥
अनुवाद: फिर पुनीत ब्राह्मणों और राजर्षि भक्तों के लिए तो कहना ही क्या! इसलिए इस अनित्य और दुखों से भरे लोक को प्राप्त होकर तू निरंतर मेरा ही भजन कर।
श्लोक ९.३४
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥३४॥
अनुवाद: तू मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, और मुझे नमस्कार कर। इस प्रकार मेरे परायण होकर और मुझको ही अपना लक्ष्य बनाकर तू निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगा।
अध्याय १०: विभूतियोग
Vibhuti Yoga
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श्लोक १०.१
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे महाबाहो अर्जुन! अब फिर से मेरे परम वचन को सुन, जिसे मैं तुझ अतिशय प्रेम करने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूँगा।
श्लोक १०.२
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥२॥
अनुवाद: न तो देवतागण मेरी उत्पत्ति को जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं; क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदि कारण हूँ।
श्लोक १०.३
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥३॥
अनुवाद: जो मुझको अजन्मा, अनादि और संपूर्ण लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में भ्रम रहित मनुष्य संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक १०.४–५
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥४॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥५॥
अनुवाद: निश्चय करने की शक्ति, ज्ञान, असम्मोह (भ्रम का अभाव), क्षमा, सत्य, इंद्रियों का दमन, मन का निग्रह, सुख, दुख, उत्पत्ति, प्रलय, भय और अभय – तथा अहिंसा, समता, संतोष, तपस्या, दान, यश और अपयश – प्राणियों के ये सभी विभिन्न प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
श्लोक १०.६
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥६॥
अनुवाद: सात महर्षि, उनसे भी पहले होने वाले सनकादि चार कुमार, तथा (स्वायम्भुव आदि) मनु – ये सभी मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं और संसार की ये सारी प्रजाएँ उन्हीं से हैं।
श्लोक १०.७
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥७॥
अनुवाद: मेरी इस ऐश्वर्य युक्त योग शक्ति को जो पुरुष तत्व से जानता है, वह निश्चल योग से युक्त होता है – इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक १०.८
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥८॥
अनुवाद: मैं ही संपूर्ण जगत का प्रभव (उत्पत्ति का कारण) हूँ और मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है – ऐसा मानकर बुद्धिमान भक्त भाव से युक्त होकर मेरा भजन करते हैं।
श्लोक १०.९
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥९॥
अनुवाद: जिनके मन मुझमें लगे हैं, जिनके प्राण मुझमें समर्पित हैं, जो एक-दूसरे को मेरा ज्ञान कराते हुए और निरंतर मेरी महिमा का बखान करते हुए संतुष्ट और प्रसन्न रहते हैं…
श्लोक १०.१०
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥१०॥
अनुवाद: उन निरंतर मुझमें जुड़े हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को मैं वह बुद्धि-योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक १०.११
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥११॥
अनुवाद: हे अर्जुन! उन पर अनुकंपा करने के लिए ही मैं उनके अंतःकरण में स्थित होकर, उनके अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को प्रकाशमान ज्ञान रूपी दीये से नष्ट करता हूँ।
श्लोक १०.१२–१३
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥१२॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥१३॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं। सभी ऋषिगण, देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास आपको शाश्वत दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं, और आप स्वयं भी मुझसे यही कहते हैं।
श्लोक १०.१४
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥१४॥
अनुवाद: हे केशव! आप मुझसे जो कुछ भी कहते हैं, मैं उसे पूर्णतः सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपकी उस वास्तविक लीला या स्वरूप को न तो देवता जानते हैं और न दानव ही।
श्लोक १०.१५
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥१५॥
अनुवाद: हे पुरुषोत्तम! हे भूतों को उत्पन्न करने वाले, हे भूतों के ईश्वर, हे देवों के देव, हे जगत के पति! आप स्वयं ही अपनी योगमाया से अपने को जानते हैं।
श्लोक १०.१६
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥१६॥
अनुवाद: आप अपनी उन दिव्य विभूतियों को पूरी तरह कहने के योग्य हैं, जिन विभूतियों के द्वारा आप इन संपूर्ण लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।
श्लोक १०.१७
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥१७॥
अनुवाद: हे योगेश्वर! मैं निरंतर आपका चिंतन करता हुआ आपको कैसे जानूँ? और हे भगवन्! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?
श्लोक १०.१८
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥१८॥
अनुवाद: हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति और विभूति को विस्तार से फिर कहिए; क्योंकि आपके इस अमृत रूप वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।
श्लोक १०.१९
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥१९॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: अच्छा, अब मैं अपनी उन दिव्य विभूतियों को प्रधानता से तुम्हारे लिए कहूँगा, क्योंकि मेरी विभूतियों का कोई अंत नहीं है।
श्लोक १०.२०
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥२०॥
अनुवाद: हे गुडाकेश (अर्जुन)! मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ, तथा संपूर्ण प्राणियों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ।
श्लोक १०.२१
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥२१॥
अनुवाद: आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, प्रकाशमानों में सूर्य (रवि) हूँ, मरुत्गणों में मरीचि हूँ, और नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ।
श्लोक १०.२२
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥२२॥
अनुवाद: वेदों में सामवेद हूँ, देवताओं में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ, और प्राणियों की चेतना (जीवन शक्ति) हूँ।
श्लोक १०.२३
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥२३॥
अनुवाद: रुद्रों में शंकर हूँ, यक्षों और राक्षसों में धन के स्वामी कुबेर (वित्तेश) हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ, और पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ।
श्लोक १०.२४
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥२४॥
अनुवाद: हे पार्थ! पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति मुझे जान, सेनापतियों में कार्तिकेय (स्कन्द) हूँ, और जलाशयों में समुद्र हूँ।
श्लोक १०.२५
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥२५॥
अनुवाद: महर्षियों में भृगु हूँ, वाणी में एक अक्षर ‘ॐ’ हूँ, यज्ञों में जप यज्ञ हूँ, और अचल रहने वालों (पर्वतों) में हिमालय हूँ।
श्लोक १०.२६
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥२६॥
अनुवाद: सभी वृक्षों में पीपल (अश्वत्थ) हूँ, देवर्षियों में नारद हूँ, गंधर्वों में चित्ररथ हूँ, और सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि हूँ।
श्लोक १०.२७
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥२७॥
अनुवाद: घोड़ों में अमृत से उत्पन्न उच्चैःश्रवा मुझे जान, हाथियों में ऐरावत हूँ, और मनुष्यों में राजा (नराधिप) हूँ।
श्लोक १०.२८
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥२८॥
अनुवाद: शस्त्रों में वज्र हूँ, गायों में कामधेनु हूँ, संतान उत्पन्न करने वाला कामदेव (कन्दर्प) हूँ, और सर्पों में वासुकी हूँ।
श्लोक १०.२९
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥२९॥
अनुवाद: नागों में अनंत (शेषनाग) हूँ, जलचरों के अधिपति वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ, और संयम रखने वालों में यमराज हूँ।
श्लोक १०.३०
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥३०॥
अनुवाद: दैत्यों में प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में काल (समय) हूँ, पशुओं में सिंह (मृगेन्द्र) हूँ, और पक्षियों में गरुड़ (वैनतेय) हूँ।
श्लोक १०.३१
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥३१॥
अनुवाद: पवित्र करने वालों में वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम हूँ, मछलियों में मकर हूँ, और नदियों में गंगा (जाह्नवी) हूँ।
श्लोक १०.३२
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥३२॥
अनुवाद: हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ। विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ, और बोलने वालों का तर्क-वितर्क (वाद) हूँ।
श्लोक १०.३३
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥३३॥
अनुवाद: अक्षरों में ‘अकार’ हूँ, समासों में द्वंद्व समास हूँ, अक्षय काल (समय) मैं हूँ, और सब ओर मुख वाले विधाता (धारण करने वाले) मैं हूँ।
श्लोक १०.३४
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४॥
अनुवाद: सबका नाश करने वाला मृत्यु मैं हूँ, और उत्पन्न होने वालों का भविष्य हूँ। स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
श्लोक १०.३५
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥३५॥
अनुवाद: सामवेद की ऋचाओं में बृहत्साम हूँ, छंदों में गायत्री छंद हूँ, महीनों में मार्गशीर्ष (अगहन) हूँ, और ऋतुओं में वसंत (कुसुमाकर) हूँ।
श्लोक १०.३६
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥३६॥
अनुवाद: छल करने वालों का जुआ (द्यूत) मैं हूँ, तेजस्वियों का तेज हूँ, विजय हूँ, निश्चय हूँ, और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।
श्लोक १०.३७
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥३७॥
अनुवाद: वृष्णि वंशियों में वासुदेव (कृष्ण) हूँ, पांडवों में अर्जुन (धनंजय) हूँ, मुनियों में व्यास हूँ, और कवियों में उशना (शुक्राचार्य) कवि हूँ।
श्लोक १०.३८
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥३८॥
अनुवाद: दमन करने वालों का दंड (शासन) हूँ, जीतने की इच्छा रखने वालों की नीति हूँ, रहस्यों में मौन हूँ, और ज्ञानियों का ज्ञान हूँ।
श्लोक १०.३९
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥३९॥
अनुवाद: हे अर्जुन! संपूर्ण प्राणियों का जो बीज (उत्पत्ति का कारण) है, वह भी मैं ही हूँ। ऐसा कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है जो मेरे बिना रह सके।
श्लोक १०.४०
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥४०॥
अनुवाद: हे परन्तप! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार केवल संक्षेप में (उद्देश्य मात्र) कहा है।
श्लोक १०.४१
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥४१॥
अनुवाद: जो-जो भी विभूतियुक्त, श्रीयुक्त और अत्यंत बलवान वस्तु है, तू उसे मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न हुई जान।
श्लोक १०.४२
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥४२॥
अनुवाद: अथवा हे अर्जुन! इस बहुत बड़े ज्ञान को जानने से क्या लाभ? मैं इस संपूर्ण जगत को अपनी योगशक्ति के केवल एक ही अंश से व्याप्त करके स्थित हूँ।
अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग
Vishvarupa Darshana Yoga
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श्लोक ११.१
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन (उपदेश) कहा है, उससे मेरा यह मोह दूर हो गया है।
श्लोक ११.२
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥२॥
अनुवाद: हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय को विस्तारपूर्वक सुना है, और आपकी वह अविनाशी महिमा भी सुनी है।
श्लोक ११.३
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥३॥
अनुवाद: हे परमेश्वर! जैसा आप अपने को कहते हैं, यह ठीक वैसा ही है। अब हे पुरुषोत्तम! मैं आपके उस ऐश्वर्ययुक्त रूप को देखना चाहता हूँ।
श्लोक ११.४
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥४॥
अनुवाद: हे प्रभो! यदि आप यह समझते हैं कि वह रूप मेरे द्वारा देखा जा सकता है, तो हे योगेश्वर! आप मुझे अपने उस अविनाशी स्वरूप के दर्शन कराइए।
श्लोक ११.५
श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥५॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों प्रकार के और नाना रंगों तथा आकृतियों वाले दिव्य रूपों को देख।
श्लोक ११.६
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥६॥
अनुवाद: हे भरतवंशी! तू मुझमें आदित्यों को, वसुओं को, रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और मरुत्गणों को देख; तथा ऐसे अनेक आश्चर्यों को देख जिन्हें तूने पहले कभी नहीं देखा था।
श्लोक ११.७
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि ॥७॥
अनुवाद: हे गुडाकेश! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित संपूर्ण जगत को देख, और जो कुछ भी तू देखना चाहता है उसे देख।
श्लोक ११.८
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥८॥
अनुवाद: किंतु तू इन अपने प्राकृत नेत्रों से मुझे देखने में समर्थ नहीं है, इसलिए मैं तुझे दिव्य दृष्टि देता हूँ; मेरी इस योग-शक्ति को देख।
श्लोक ११.९
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥९॥
अनुवाद: संजय ने कहा: हे राजन्! महायोगेश्वर और सर्वशक्तिमान हरि ने ऐसा कहकर तब अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्ययुक्त रूप दिखाया।
श्लोक ११.१०–११
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥१०॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥११॥
अनुवाद: अनेक मुखों और नेत्रों वाले, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, अनेक दिव्य आभूषणों और अनेक दिव्य उठाए हुए शस्त्रों वाले… दिव्य मालाओं और वस्त्रों को धारण करने वाले, दिव्य गंधों से लेप किए हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, असीम और सब ओर मुख वाले उस देव (विश्वरूप) को अर्जुन ने देखा।
श्लोक ११.१२
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥१२॥
अनुवाद: आकाश में यदि हजारों सूर्यों का प्रकाश एक साथ ही प्रकट हो जाए, तो वह भी उस महात्मा (विश्वरूप परमात्मा) के प्रकाश के सदृश ही होगा।
श्लोक ११.१३
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥१३॥
अनुवाद: उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अनेक प्रकार से विभक्त संपूर्ण जगत को उस देवों के देव (श्रीकृष्ण) के शरीर में एक जगह स्थित देखा।
श्लोक ११.१४
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥१४॥
अनुवाद: इसके बाद आश्चर्य से चकित और जिनके शरीर के रोंगटे खड़े हो गए थे, उन धनंजय (अर्जुन) ने सिर झुकाकर और हाथ जोड़कर देव को प्रणाम करते हुए कहा।
श्लोक ११.१५
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥१५॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे देव! मैं आपके शरीर में संपूर्ण देवताओं को और प्राणियों के विशेष समुदायों को देख रहा हूँ; कमल के आसन पर विराजमान ब्रह्माजी को, शिवजी को, और संपूर्ण ऋषियों तथा दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।
श्लोक ११.१६
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥१६॥
अनुवाद: हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपको अनेक भुजाओं, पेटों, मुखों और नेत्रों वाले तथा सब ओर से अनंत रूपों वाले देखता हूँ। मैं न तो आपका अंत देखता हूँ, न मध्य और न ही आदि।
श्लोक ११.१७
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥१७॥
अनुवाद: मैं आपको मुकुट से युक्त, गदा और चक्र धारण किए हुए, सब तरफ से प्रकाशमान तेज के पुंज के रूप में देखता हूँ। प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान प्रकाश वाले, आपके इस अप्रमेय और कठिनता से देखे जाने वाले रूप को मैं सब ओर से देखता हूँ।
श्लोक ११.१८
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥१८॥
अनुवाद: आप ही जानने योग्य परम अक्षर (ब्रह्म) हैं, आप ही इस विश्व के परम आश्रय हैं, आप ही अविनाशी और शाश्वत धर्म के रक्षक हैं, और आप ही सनातन पुरुष हैं – ऐसा मेरा मत है।
श्लोक ११.१९
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥१९॥
अनुवाद: आप आदि, मध्य और अंत से रहित हैं, आपका सामर्थ्य अनंत है, आपकी अनगिनत भुजाएँ हैं, और चंद्रमा तथा सूर्य आपके नेत्र हैं। मैं आपको प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले और अपने तेज से इस संपूर्ण ब्रह्मांड को तपाते हुए देखता हूँ।
श्लोक ११.२०
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥२०॥
अनुवाद: हे महात्मन्! पृथ्वी और आकाश के बीच का यह सारा अंतर और सभी दिशाएँ केवल आपसे ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक अत्यंत भयभीत हो रहे हैं।
श्लोक ११.२१
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥२१॥
अनुवाद: वे देवताओं के समूह आप में प्रवेश कर रहे हैं; उनमें से कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नाम और गुणों का उच्चारण कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समूह “कल्याण हो!” ऐसा कहकर उत्तम स्तुतियों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।
श्लोक ११.२२
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥२२॥
अनुवाद: जो रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुत्गण, ऊष्मपा (पितृगण), गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समूह हैं – वे सभी विस्मित होकर आपको देख रहे हैं।
श्लोक ११.२३
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥२३॥
अनुवाद: हे महाबाहो! आपके अनेक मुखों और नेत्रों वाले, अनेक भुजाओं, जाँघों और पैरों वाले, अनेक पेटों वाले और अनेक भयानक दाढ़ों वाले इस महान रूप को देखकर सभी लोक व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी अत्यंत भयभीत हो रहा हूँ।
श्लोक ११.२४
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥२४॥
अनुवाद: हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाला, अनेक वर्णों से दीप्त, खुले हुए मुखों और चमकते हुए विशाल नेत्रों वाले आपको देखकर मेरा अंतःकरण भयभीत हो रहा है, और मुझे धैर्य तथा शांति नहीं मिल रही है।
श्लोक ११.२५
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥२५॥
अनुवाद: प्रलय काल की अग्नि के समान भयानक और दाढ़ों से डरावने आपके मुखों को देखकर, न तो मुझे दिशाओं का ज्ञान हो रहा है और न ही सुख मिल रहा है। हे देवेश! हे जगन्निवास! मुझ पर प्रसन्न होइए।
श्लोक ११.२६–२७
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥२६॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥२७॥
अनुवाद: धृतराष्ट्र के सभी पुत्र राजाओं के समूहों सहित, भीष्म, द्रोण, और वह कर्ण – तथा हमारी सेना के भी मुख्य योद्धा – आपके उन भयानक दाढ़ों वाले डरावने मुखों में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं। कुछ लोग तो दाढ़ों के बीच में फँसे हुए और अपने सिरों को चूर्ण हुए दिखाई दे रहे हैं।
श्लोक ११.२८
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥२८॥
अनुवाद: जैसे नदियों के जल के अनेक वेग समुद्र की ओर ही दौड़ते हैं, वैसे ही संसार के ये वीर योद्धा आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
श्लोक ११.२९
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्-
तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥२९॥
अनुवाद: जैसे पतंगे अपने नाश के लिए तीव्र वेग से प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सभी लोग अपने नाश के लिए तीव्र वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
श्लोक ११.३०
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्-
लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥३०॥
अनुवाद: आप अपने प्रज्वलित मुखों से संपूर्ण लोकों को चारों ओर से चाटते हुए ग्रस रहे हैं। हे विष्णो! आपके उग्र प्रकाश से संपूर्ण जगत तेज से परिपूर्ण होकर तप रहा है।
श्लोक ११.३१
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥३१॥
अनुवाद: मुझे बताइए कि आप इतने उग्र रूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो, मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं आपको जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी इस प्रवृत्ति को नहीं समझ पा रहा हूँ।
श्लोक ११.३२
श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥३२॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय यहाँ लोकों का संहार करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे बिना भी दोनों सेनाओं में स्थित ये सभी योद्धा नहीं बचेंगे।
श्लोक ११.३३
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥३३॥
अनुवाद: इसलिए तू खड़ा हो जा, यश प्राप्त कर, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग कर। ये सब पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं; हे सव्यसाची (अर्जुन)! तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।
श्लोक ११.३४
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥३४॥
अनुवाद: द्रोणाचार्य, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य वीर योद्धाओं को – जो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं – तू मार डाल; भय मत कर। तू युद्ध कर, रणक्षेत्र में तू अपने शत्रुओं को जरूर जीतेगा।
श्लोक ११.३५
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥३५॥
अनुवाद: संजय ने कहा: केशव के इन वचनों को सुनकर, मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपते हुए, बार-बार नमस्कार करके, भयभीत होकर गदगद वाणी से कृष्ण से बोले।
श्लोक ११.३६
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥३६॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति से जगत प्रफुल्लित हो रहा है और उसमें अनुराग कर रहा है। राक्षस भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग रहे हैं, और सिद्धों के समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं।
श्लोक ११.३७
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥३७॥
अनुवाद: हे महात्मन्! वे आपको नमस्कार क्यों न करें, जो ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े हैं? हे अनंत! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्, असत् और उससे परे अक्षर ब्रह्म है, वह आप ही हैं।
श्लोक ११.३८
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्-
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥३८॥
अनुवाद: आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस विश्व के परम आश्रय हैं, आप जानने वाले और जानने योग्य तथा परम धाम हैं। हे अनंत रूप! यह संपूर्ण विश्व आपसे ही व्याप्त है।
श्लोक ११.३९
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥३९॥
अनुवाद: आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजापति और प्रपितामह हैं। आपको हजारों बार नमस्कार हो! आपको फिर से और बार-बार नमस्कार हो!
श्लोक ११.४०
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥४०॥
अनुवाद: आपके आगे से, पीछे से, और सब ओर से आपको मेरा नमस्कार हो! हे अनंत पराक्रम वाले! आप सब कुछ व्याप्त किए हुए हैं, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।
श्लोक ११.४१–४२
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥४१॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥४२॥
अनुवाद: आपको अपना सखा न जानते हुए, अज्ञानता से या प्रेमवश हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे – इस प्रकार जो कुछ मैंने बिना सोचे-समझे कह दिया है; और विहार करते समय, सोते समय, बैठते समय या भोजन करते समय, अकेले में या दोस्तों के सामने आपका जो अनादर किया है, हे अच्युत, उस सबके लिए मैं अप्रमेय आपसे क्षमा माँगता हूँ।
श्लोक ११.४३
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥४३॥
अनुवाद: आप इस चराचर जगत के पिता हैं, सबसे बड़े पूजनीय और गुरु हैं। हे अप्रतिम प्रभाव वाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर आपसे अधिक तो कोई हो ही कैसे सकता है!
श्लोक ११.४४
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥४४॥
अनुवाद: इसलिए, हे ईश्वर! मैं शरीर को अच्छी तरह झुकाकर आपको प्रणाम करता हूँ और आपकी स्तुति करता हूँ। हे देव! जैसे पिता अपने पुत्र के, मित्र अपने सखा के, और पति अपनी प्रियतमा के अपराधों को सहन करता है, वैसे ही आप मेरे अपराधों को सहन करने के योग्य हैं।
श्लोक ११.४५
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥४५॥
अनुवाद: पहले कभी न देखे गए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ, किंतु मेरा मन भय से बहुत व्यथित भी हो रहा है। इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप मुझ पर प्रसन्न होइए और अपने उसी चतुर्भुज रूप को फिर से मुझे दर्शाइए।
श्लोक ११.४६
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-
मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥४६॥
अनुवाद: मैं मुकुट पहने हुए, गदा और चक्र हाथ में लिए हुए आपको उसी रूप में देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहु! हे विश्वमूर्ते! आप अपने उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट हो जाइए।
श्लोक ११.४७
श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥४७॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे अर्जुन! मुझ पर प्रसन्न होकर मैंने अपनी योगशक्ति से यह तुम्हें अपना परम तेजोमय, अनंत और आदि विश्वरूप दिखाया है, जिसे तुम्हारे अलावा पहले किसी दूसरे ने नहीं देखा था।
श्लोक ११.४८
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्-
न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥४८॥
अनुवाद: हे कुरुवीर अर्जुन! मनुष्य लोक में न तो वेदों के अध्ययन से, न यज्ञों से, न दान से, न क्रियाओं से, और न ही उग्र तपस्याओं से मेरे इस विश्वरूप को तुम्हारे अलावा किसी अन्य द्वारा देखा जा सकता है।
श्लोक ११.४९
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥४९॥
अनुवाद: मेरे इस घोर रूप को देखकर तुझे न तो व्यथा होनी चाहिए और न ही मूर्छा (विमूढ़ भाव)। भय से रहित और प्रसन्न चित्त वाला होकर तू मेरे उसी सामान्य रूप को फिर से देख।
श्लोक ११.५०
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥५०॥
अनुवाद: संजय ने कहा: अर्जुन से ऐसा कहकर वासुदेव (श्रीकृष्ण) ने फिर से अपने उसी सौम्य रूप को दिखाया, और महात्मा श्रीकृष्ण ने भयभीत अर्जुन को आश्वासन देकर शांत किया।
श्लोक ११.५१
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥५१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे जनार्दन! आपके इस मनुष्य रूप को देखकर अब मैं शांत चित्त हो गया हूँ और अपनी सामान्य प्रकृति को प्राप्त हो गया हूँ।
श्लोक ११.५२
श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥५२॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: मेरा जो यह रूप तुमने देखा है, यह अत्यंत दुर्लभ है। देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए हमेशा लालायित रहते हैं।
श्लोक ११.५३
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥५३॥
अनुवाद: जैसा रूप तुमने मुझे देखा है, इस प्रकार के रूप को न तो वेदों से, न तपस्या से, न दान से, और न ही यज्ञ से देखा जा सकता है।
श्लोक ११.५४
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥५४॥
अनुवाद: किंतु हे परन्तप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा ही मुझे इस प्रकार प्रत्यक्ष देखा जा सकता है, तत्व से जाना जा सकता है और मुझमें प्रवेश भी किया जा सकता है।
श्लोक ११.५५
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥५५॥
अनुवाद: हे पाण्डव! जो पुरुष केवल मेरे लिए कर्म करता है, जो मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्ति से रहित है, और सभी प्राणियों में बैर-भाव से रहित है, वह निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होता है।
अध्याय १२: भक्तियोग
Bhakti Yoga
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श्लोक १२.१
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: जो भक्त निरंतर आपके भजन में लगे रहते हैं, और जो दूसरे अविनाशी और अव्यक्त (निराकार) की उपासना करते हैं – इन दोनों में उत्तम योगी कौन हैं?
श्लोक १२.२
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥२॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: जो भक्त मुझमें मन को एकाग्र करके, निरंतर मुझमें जुड़े रहकर परम श्रद्धा के साथ मेरी उपासना करते हैं, वे मुझे योगियों में सबसे श्रेष्ठ (युक्ततम) मान्य हैं।
श्लोक १२.३–४
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटस्थमचलन्ध्रुवम् ॥३॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥४॥
अनुवाद: किंतु जो पुरुष वेदों में कहे गए उस अव्यक्त, निराकार, अचिंत्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव (अविनाशी) अक्षर ब्रह्म की उपासना करते हैं, जो सभी इंद्रियों को वश में रखते हैं और सभी परिस्थितियों में समबुद्धि रखते हैं – वे सभी प्राणियों के हित में लगे रहकर अंततः मुझको ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक १२.५
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥५॥
अनुवाद: उन अव्यक्त (निराकार) में मन लगाने वाले पुरुषों के लिए मार्ग अधिक कष्टप्रद होता है; क्योंकि देहधारियों के लिए अव्यक्त गति को प्राप्त करना बहुत कठिन है।
श्लोक १२.६–७
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥६॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥७॥
अनुवाद: किंतु जो लोग अपने संपूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, अनन्य योग द्वारा निरंतर मेरा ध्यान करते हुए उपासना करते हैं – हे पार्थ! उन मय्यावेशित चित्त वाले भक्तों का मृत्यु रूपी संसार सागर से मैं शीघ्र ही उद्धार करने वाला बनता हूँ।
श्लोक १२.८
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥८॥
अनुवाद: तू मुझमें ही मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को स्थापित कर; इसके बाद तू मुझमें ही निवास करेगा – इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक १२.९
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥९॥
अनुवाद: यदि तू मुझमें मन को अचल रूप से स्थापित करने में समर्थ नहीं है, तो हे धनंजय! अभ्यास रूप योग के द्वारा मुझको प्राप्त करने की इच्छा कर।
श्लोक १२.१०
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥१०॥
अनुवाद: यदि तू अभ्यास करने में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिए कर्म करते हुए भी तू सिद्धि को प्राप्त हो जाएगा।
श्लोक १२.११
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥११॥
अनुवाद: यदि तू मेरी इस भक्ति को करने में भी असमर्थ है, तो मन को वश में करते हुए मेरी शरण में आ जा और सभी कर्मों के फलों का त्याग कर दे।
श्लोक १२.१२
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥१२॥
अनुवाद: अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, और ध्यान से सभी कर्मों के फलों का त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि त्याग से तुरंत ही शांति मिलती है।
श्लोक १२.१३–१४
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥१३॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१४॥
अनुवाद: जो पुरुष किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, जो सबका मित्र और करुणावान है, जो ममत्व और अहंकार से रहित है, सुख-दुख में समान रहता है और क्षमाशील है; जो सदा संतुष्ट रहता है, योगी है, जिसने मन को जीत लिया है और जिसका निश्चय दृढ़ है – ऐसा मुझमें मन और बुद्धि को अर्पित करने वाला मेरा भक्त मुझे अति प्रिय है।
श्लोक १२.१५
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥१५॥
अनुवाद: जिससे किसी को कोई कष्ट नहीं होता और जो किसी से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेग से पूरी तरह मुक्त है – वह भक्त मुझे बहुत प्रिय है।
श्लोक १२.१६
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१६॥
अनुवाद: जो किसी भी कामना से रहित, पवित्र, चतुर, पक्षपात से रहित, चिंताओं से मुक्त, और सभी आरंभों (कर्मों के संकल्पों) का त्याग करने वाला है – ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
श्लोक १२.१७
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥१७॥
अनुवाद: जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और न कोई कामना रखता है; जो शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों के फलों का त्यागी है – ऐसा भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है।
श्लोक १२.१८–१९
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥१८॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥१९॥
अनुवाद: जो शत्रु और मित्र में समान है, मान और अपमान में एक-सा है; ठंड और गर्मी, सुख और दुख में समभाव रखता है और आसक्ति से रहित है; जो निंदा और स्तुति को समान समझता है, मौन रहता है, जो कुछ भी मिल जाए उसमें संतुष्ट रहता है, जिसका कोई निश्चित घर नहीं है और जिसकी बुद्धि स्थिर है – ऐसा भक्तिमान मनुष्य मुझे प्रिय है।
श्लोक १२.२०
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥२०॥
अनुवाद: किंतु जो लोग इस धर्मयुक्त और अमृत रूप धर्म का, मेरे कहे अनुसार श्रद्धा के साथ पालन करते हैं, और जो मेरे परायण हैं – वे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं।
अध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
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अर्जुन का प्रश्न (प्रारंभिक श्लोक)
अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष को, तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को, तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।
श्लोक १३.१
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे कौन्तेय! यह शरीर ‘क्षेत्र’ कहलाता है, और जो इसे जानता है, उसे तत्वज्ञानी ‘क्षेत्रज्ञ’ कहते हैं।
श्लोक १३.२
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥२॥
अनुवाद: हे भारत! तू सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ (आत्मा) भी मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही वास्तविक ज्ञान है – ऐसा मेरा मत है।
श्लोक १३.३
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥३॥
अनुवाद: वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसके विकार क्या हैं, वह किससे उत्पन्न हुआ है, और वह क्षेत्रज्ञ क्या है तथा उसका प्रभाव क्या है – यह सब मुझसे संक्षेप में सुन।
श्लोक १३.४
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥४॥
अनुवाद: यह तत्व ऋषियों द्वारा वेदों में विभिन्न प्रकार से गाया गया है, और भली-भांति निश्चित किए गए ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।
श्लोक १३.५–६
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥५॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥६॥
अनुवाद: पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, मूल प्रकृति, दस इंद्रियाँ, एक मन, और पाँच इंद्रियों के विषय – इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, शरीर का संघात, चेतना और धृति – इन सबके सहित यह क्षेत्र संक्षेप में विकारों सहित कहा गया है।
श्लोक १३.७–११
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥७॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥८॥
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥९॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥१०॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥११॥
अनुवाद: अमानिता, अदंभिता, अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्य की सेवा, पवित्रता, स्थिरता, और मन का निग्रह; इंद्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, तथा जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग में दुख एवं दोषों का दर्शन; पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति का अभाव और ममता न होना, तथा प्रिय एवं अप्रिय की प्राप्ति में सदा समचित्त रहना; मुझमें अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति, एकांत स्थानों में प्रेम और विषयासक्त लोगों की सभा में अरुचि; अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थ का दर्शन – यह सब ज्ञान है, और इसके विपरीत जो है वह अज्ञान है – ऐसा कहा गया है।
श्लोक १३.१२
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥१२॥
अनुवाद: जो जानने योग्य है और जिसे जानकर मनुष्य अमरता को प्राप्त होता है, अब मैं उसका वर्णन करूँगा। वह अनादि और मत्पर (परम ब्रह्म) है, जिसे न सत् कहा जा सकता है और न असत्।
श्लोक १३.१३
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१३॥
अनुवाद: वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला, तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।
श्लोक १३.१४
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥१४॥
अनुवाद: वह सभी इंद्रियों के गुणों को प्रकाशित करने वाला है, किंतु सभी इंद्रियों से रहित है; वह आसक्तिहीन होने पर भी सबका पोषण करने वाला है, और गुणों से रहित होने पर भी गुणों का भोक्ता है।
श्लोक १३.१५
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥१५॥
अनुवाद: वह सभी प्राणियों के बाहर और भीतर परिपूर्ण है, चर और अचर रूप भी वही है; वह सूक्ष्म होने के कारण अविज्ञेय है, और वह अति दूर होने पर भी अत्यंत निकट है।
श्लोक १३.१६
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥१६॥
अनुवाद: वह अविभाजित होने पर भी प्राणियों में विभाजित की तरह स्थित है; वह जानने योग्य परमात्मा सभी भूतों का पालनहार, ग्रसने वाला और उत्पन्न करने वाला है।
श्लोक १३.१७
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥१७॥
अनुवाद: वह ज्योतियों का भी ज्योति और अंधकार से परे कहा गया है। वह ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञान से प्राप्त होने योग्य परमात्मा सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।
श्लोक १३.१८
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥१८॥
अनुवाद: इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय – इन सबका संक्षेप में वर्णन कर दिया गया है। मेरा भक्त इसे अच्छी तरह जानकर मेरे भाव को प्राप्त होता है।
श्लोक १३.१९
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥१९॥
अनुवाद: प्रकृति और पुरुष – इन दोनों को तू अनादि जान; और जितने भी विकार तथा गुण हैं, वे सब प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं – ऐसा जान।
श्लोक १३.२०
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥२०॥
अनुवाद: कार्य और करण (शरीर और इंद्रियों) को उत्पन्न करने में प्रकृति को कारण कहा जाता है, और सुख-दुख के भोक्तापन में पुरुष (जीवात्मा) को कारण कहा जाता है।
श्लोक १३.२१
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥२१॥
अनुवाद: प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। गुणों के साथ उसका संग ही उसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।
श्लोक १३.२२
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥२२॥
अनुवाद: इस देह में स्थित परम पुरुष साक्षी (उपद्रष्टा), अनुमति देने वाला (अनुमन्ता), सबका भरण-पोषण करने वाला (भर्ता), भोक्ता और महेश्वर है; उसी को परमात्मा भी कहा गया है।
श्लोक १३.२३
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥२३॥
अनुवाद: जो मनुष्य इस प्रकार पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को तत्व से जान लेता है, वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता।
श्लोक १३.२४
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥२४॥
अनुवाद: कुछ लोग ध्यान के द्वारा शुद्ध बुद्धि से अपने हृदय में परमात्मा को देखते हैं, कुछ ज्ञानयोग (सांख्ययोग) के द्वारा, और कुछ अन्य कर्मयोग के द्वारा देखते हैं।
श्लोक १३.२५
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥२५॥
अनुवाद: किंतु कुछ अन्य लोग, जो स्वयं इस प्रकार नहीं जानते, दूसरों से (तत्वज्ञ महापुरुषों से) सुनकर उपासना करते हैं। सुने हुए उपदेश के परायण वे लोग भी मृत्यु रूपी संसार-सागर को निःसंदेह पार कर जाते हैं।
श्लोक १३.२६
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥२६॥
अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! जितने भी स्थावर (अचल) और जंगम (चल) प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न हुआ जान।
श्लोक १३.२७
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥२७॥
अनुवाद: जो पुरुष नष्ट होते हुए सभी प्राणियों में नाशरहित परमेश्वर को समान रूप से स्थित देखता है, वही वास्तव में देखता है।
श्लोक १३.२८
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥२८॥
अनुवाद: क्योंकि सर्वत्र समान रूप से स्थित परमेश्वर को समभाव से देखने वाला मनुष्य अपने द्वारा अपना पतन नहीं करता; इसलिए वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक १३.२९
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥२९॥
अनुवाद: जो यह देखता है कि सभी कर्म सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हैं, और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही वास्तव में देखता है।
श्लोक १३.३०
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥३०॥
अनुवाद: जब मनुष्य प्राणियों के अलग-अलग भावों को एक परमात्मा में ही स्थित देखता है और उसी से सबका विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक १३.३१
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥३१॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! अनादि और निर्गुण होने के कारण यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी न तो कुछ करता है और न ही लिप्त होता है।
श्लोक १३.३२
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥३२॥
अनुवाद: जैसे सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा भी देह के गुणों से लिप्त नहीं होता।
श्लोक १३.३३
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥३३॥
अनुवाद: हे भारत! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस संपूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार क्षेत्री (आत्मा) संपूर्ण क्षेत्र (शरीर) को प्रकाशित करता है।
श्लोक १३.३४
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥३४॥
अनुवाद: इस प्रकार जो लोग ज्ञान रूपी नेत्रों से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के अंतर को, तथा प्राणियों के प्रकृति से मुक्त होने के उपाय को जान लेते हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं।
अध्याय १४: गुणत्रयविभागयोग
Gunatraya Vibhaga Yoga
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श्लोक १४.१
श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: ज्ञानों में भी उत्तम, उस परम ज्ञान को मैं फिर से कहूँगा, जिसे जानकर सभी मुनिगण इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं।
श्लोक १४.२
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥२॥
अनुवाद: इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में भी उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्यथित (नष्ट) नहीं होते।
श्लोक १४.३
मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥३॥
अनुवाद: हे भारत! मेरी मूल प्रकृति (महद्ब्रह्म) संपूर्ण भूतों की योनि (गर्भधारण का स्थान) है, और मैं उसमें गर्भ स्थापित करता हूँ। उसी से सभी भूतों की उत्पत्ति होती है।
श्लोक १४.४
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥४॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! जितनी भी योनियाँ विभिन्न रूपों में उत्पन्न होती हैं, उन सबका योनि-स्थान (प्रकृति) महान ब्रह्म है, और मैं बीज स्थापित करने वाला पिता हूँ।
श्लोक १४.५
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥५॥
अनुवाद: हे महाबाहो! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण – प्रकृति से उत्पन्न होने वाले ये तीनों गुण इस शरीर में अविनाशी जीव (आत्मा) को बांध लेते हैं।
श्लोक १४.६
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥६॥
अनुवाद: हे पापरहित अर्जुन! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है। वह सुख और ज्ञान की आसक्ति से जीव को बांधता है।
श्लोक १४.७
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥७॥
अनुवाद: रजोगुण को रागात्मक (कामना और आसक्ति से युक्त) जान, जो तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है। हे कौन्तेय! वह इस देही को कर्मों की आसक्ति से बांधता है।
श्लोक १४.८
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥८॥
अनुवाद: हे भारत! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न हुआ और सभी देहधारियों को मोहित करने वाला जान। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है।
श्लोक १४.९
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥९॥
अनुवाद: हे भारत! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है, और तमोगुण ज्ञान को ढँककर प्रमाद (असावधानी) में लगा देता है।
श्लोक १४.१०
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१०॥
अनुवाद: हे भारत! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है; वैसे ही सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है; और इसी प्रकार सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है।
श्लोक १४.११
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥११॥
अनुवाद: जब इस शरीर के सभी द्वारों (इंद्रियों) में ज्ञान रूपी प्रकाश उत्पन्न होता है, तब ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।
श्लोक १४.१२
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥१२॥
अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरंभ, अशांति और कामना – ये सभी उत्पन्न होते हैं।
श्लोक १४.१३
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥१३॥
अनुवाद: हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अंधकार (अप्रकाश), अकर्मण्यता, प्रमाद और मोह – ये सभी उत्पन्न होते हैं।
श्लोक १४.१४
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४॥
अनुवाद: जब मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में शरीर छोड़ता है, तब वह उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।
श्लोक १४.१५
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥१५॥
अनुवाद: रजोगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होने पर वह कर्मों में आसक्ति रखने वालों (मनुष्यों) में जन्म लेता है, और तमोगुण में मृत हुआ मनुष्य मूर्ख योनियों (पशु-पक्षियों आदि) में जन्म लेता है।
श्लोक १४.१६
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥१६॥
अनुवाद: श्रेष्ठ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है; रजोगुण का फल दुख है, और तमोगुण का फल अज्ञान है।
श्लोक १४.१७
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१७॥
अनुवाद: सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है, और तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं।
श्लोक १४.१८
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१८॥
अनुवाद: सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर (देवलोक आदि) को जाते हैं, राजस लोग मध्य में (मनुष्य लोक में) रहते हैं, और जघन्य तामस गुणों में स्थित लोग नीचे (नरक या पशु योनियों) को जाते हैं।
श्लोक १४.१९
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥१९॥
अनुवाद: जब द्रष्टा (विवेकवान मनुष्य) यह देखता है कि गुणों के सिवा दूसरा कोई कर्ता नहीं है, और गुणों से परे परमात्मा को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
श्लोक १४.२०
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥२०॥
अनुवाद: शरीर को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों को लाँघकर देही (आत्मा) जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और सब दुखों से मुक्त होकर अमृत (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
श्लोक १४.२१
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥२१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे प्रभो! इन तीनों गुणों को पार करने वाला पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है? उसका आचरण कैसा होता है, और वह इन तीनों गुणों को कैसे लाँघता है?
श्लोक १४.२२–२५
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥२२॥
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥२३॥
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥२४॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥२५॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: हे पाण्डव! जो प्रकाश (सत्त्वगुण), प्रवृत्ति (रजोगुण) और मोह (तमोगुण) के प्रकट होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके न होने पर उनकी आकांक्षा नहीं करता; जो उदासीन की तरह स्थित रहता है और गुणों द्वारा विचलित नहीं होता; जो यह जानता है कि केवल गुण ही गुणों में बरत रहे हैं और ऐसा जानकर जो अपनी स्थिति में अचल रहता है; जो सुख-दुख में समान, अपनी आत्मा में स्थित, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान समझने वाला, प्रिय और अप्रिय में एक-सा, धीरजवान, निंदा और स्तुति में समान; मान और अपमान में एक-सा, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान, तथा सभी आरंभों (कर्मों के संकल्पों) का त्यागी है – ऐसा पुरुष ‘गुणातीत’ (गुणों से परे) कहा जाता है।
श्लोक १४.२६
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥२६॥
अनुवाद: और जो पुरुष अनन्य भक्ति योग के द्वारा निरंतर मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पूरी तरह लाँघकर ब्रह्म को प्राप्त होने के योग्य बन जाता है।
श्लोक १४.२७
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥२७॥
अनुवाद: क्योंकि उस अविनाशी ब्रह्म की, अमृत की, शाश्वत धर्म की, और आत्यंतिक (परम) सुख की प्रतिष्ठा (आश्रय) मैं ही हूँ।
अध्याय १५: पुरुषोत्तमयोग
Purushottama Yoga
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श्लोक १५.१
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: ऊपर की ओर मूल वाले और नीचे की ओर शाखाओं वाले इस संसार रूपी पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहा गया है, जिसके वेद पत्ते कहे गए हैं। इस वृक्ष को जो मनुष्य अच्छी तरह जानता है, वह वेदों को जानने वाला (तत्वज्ञ) है।
श्लोक १५.२
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥२॥
अनुवाद: इस संसार रूपी वृक्ष की तीनों गुणों से बढ़ी हुई और विषयों (शब्द, स्पर्श आदि) रूपी कोंपलों वाली शाखाएँ ऊपर और नीचे दोनों ओर फैली हुई हैं। मनुष्य लोक में कर्मों के बंधन में बाँधने वाली इसकी मूल जड़ें नीचे की ओर भी फैली हुई हैं।
श्लोक १५.३
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥३॥
अनुवाद: इस संसार रूपी वृक्ष का रूप, इसका आदि, अंत और इसकी स्थिति यहाँ जैसी समझी जाती है, वैसी वास्तव में नहीं है। इसलिए इस मज़बूत मूल वाले पीपल के वृक्ष को अनासक्ति रूपी दृढ़ शस्त्र से काटकर…
श्लोक १५.४
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥४॥
अनुवाद: उस परम पद को खोजना चाहिए, जहाँ पहुँचने वाले मनुष्य फिर इस संसार में लौटकर नहीं आते। जिस आदि पुरुष से इस पुरानी संसार-प्रवृत्ति का विस्तार हुआ है, मैं उसी की शरण हूँ – ऐसा दृढ़ निश्चय करके उसकी आराधना करनी चाहिए।
श्लोक १५.५
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्-
गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥५॥
अनुवाद: जो मान और मोह से रहित हैं, जिन्होंने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है, जो निरंतर अध्यात्म में स्थित हैं, जिनकी कामनाएँ सर्वथा निवृत्त हो चुकी हैं, और जो सुख-दुख नामक द्वंद्वों से मुक्त हैं, ऐसे भ्रमरहित पुरुष उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक १५.६
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥६॥
अनुवाद: उस परम धाम को न तो सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न ही अग्नि। वहाँ पहुँचकर मनुष्य इस संसार में वापस नहीं आते – वही मेरा परम धाम है।
श्लोक १५.७
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥७॥
अनुवाद: इस संसार में जीव रूप सनातन आत्मा मेरा ही एक अंश है, जो प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इंद्रियों को आकर्षित करता है (अपने अधीन रखता है)।
श्लोक १५.८
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥८॥
अनुवाद: वायु जैसे गंध को उसके स्थान (फूल आदि) से ले जाता है, वैसे ही शरीरों का स्वामी यह जीव जिस शरीर को छोड़कर जाता है, इन मन और इंद्रियों को साथ लेकर फिर नए शरीर को प्राप्त होता है।
श्लोक १५.९
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥९॥
अनुवाद: यह जीव कान, नेत्र, त्वचा, जीभ और नाक – इन सभी इंद्रियों तथा मन का आश्रय लेकर विषयों का सेवन करता है।
श्लोक १५.१०
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥१०॥
अनुवाद: शरीर को छोड़कर जाते हुए, शरीर में स्थित हुए, या विषयों को भोगते हुए – गुणों से युक्त इस जीव को अज्ञानी लोग नहीं देख पाते, किंतु ज्ञान रूपी नेत्रों वाले ज्ञानी इसे स्पष्ट रूप से देखते हैं।
श्लोक १५.११
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥११॥
अनुवाद: प्रयत्नशील योगी जन तो अपनी आत्मा में स्थित इस परमात्मा को साफ देख लेते हैं, किंतु जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है, वे अज्ञानी लाख प्रयत्न करने पर भी इसे नहीं देख पाते।
श्लोक १५.१२
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥१२॥
अनुवाद: सूर्य का जो तेज पूरे जगत को प्रकाशित करता है, जो तेज चंद्रमा में है और जो अग्नि में है – उस समस्त तेज को तू मेरा ही तेज जान।
श्लोक १५.१३
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥१३॥
अनुवाद: और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सभी भूतों को धारण करता हूँ, तथा रसात्मक चंद्रमा बनकर सभी औषधियों (अन्न और वनस्पतियों) का पोषण करता हूँ।
श्लोक १५.१४
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१४॥
अनुवाद: मैं ही सभी प्राणियों के शरीर में स्थित जठराग्नि (वैश्वानर) बनकर, प्राण और अपान वायु से संयुक्त होकर, चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
श्लोक १५.१५
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१५॥
अनुवाद: मैं ही सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका लोप होता है। समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य, वेदांत का रचयिता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ।
श्लोक १५.१६
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥१६॥
अनुवाद: इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं – क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी)। संपूर्ण भूत प्राणी ‘क्षर’ हैं, और विकार रहित कूटस्थ आत्मा ‘अक्षर’ कहा जाता है।
श्लोक १५.१७
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१७॥
अनुवाद: इन दोनों से उत्तम तो दूसरा ही ‘परम पुरुष’ है, जिसे ‘परमात्मा’ कहा जाता है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका पोषण करता है।
श्लोक १५.१८
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥१८॥
अनुवाद: चूँकि मैं नाशवान (क्षर) से पूरी तरह अतीत हूँ और अविनाशी (अक्षर) से भी उत्तम हूँ, इसलिए संसार में और वेदों में ‘पुरुषोत्तम’ के नाम से प्रसिद्ध हूँ।
श्लोक १५.१९
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥१९॥
अनुवाद: हे भारत! जो भ्रमरहित मनुष्य मुझको इस प्रकार तत्व से ‘पुरुषोत्तम’ जानता है, वह सर्वज्ञ है और सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है।
श्लोक १५.२०
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥२०॥
अनुवाद: हे पापरहित अर्जुन! इस प्रकार यह अत्यंत गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा तुमसे कह दिया गया है। इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान और अपने सभी कर्तव्यों में कृतकृत्य (सफल) हो जाता है।
अध्याय १६: दैवासुरसम्पद्विभागयोग
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
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श्लोक १६.१
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥१॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: अभय (निडरता), अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति, दान, इंद्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय (वेदों का अध्ययन), तप और सरलता…
श्लोक १६.२
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥२॥
अनुवाद: अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, चुगली न करना (अपैशुनम्), प्राणियों पर दया, विषयों में आसक्ति का अभाव, कोमलता, लज्जा (मर्यादा), और चंचलता का अभाव…
श्लोक १६.३
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥३॥
अनुवाद: तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से द्रोह न करना, और मान-बड़ाई की इच्छा न होना – हे भारत! ये सब दैवी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
श्लोक १६.४
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥४॥
अनुवाद: हे पार्थ! पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान – ये सब आसुरी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए मनुष्य के लक्षण हैं।
श्लोक १६.५
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥५॥
अनुवाद: दैवी संपदा मुक्ति (मोक्ष) के लिए और आसुरी संपदा बंधन के लिए मानी गई है। हे पाण्डव! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी संपदा को लेकर उत्पन्न हुआ है।
श्लोक १६.६
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥६॥
अनुवाद: इस संसार में प्राणियों की दो ही सृष्टियाँ हैं – एक दैवी और दूसरी आसुरी। दैवी प्रकृति का विस्तार से वर्णन कर दिया गया है, अब हे पार्थ! तू आसुरी प्रकृति के बारे में मुझसे सुन।
श्लोक १६.७
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥७॥
अनुवाद: आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य यह नहीं जानते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। उनमें न तो बाहर-भीतर की पवित्रता होती है, न आचार होता है, और न ही सत्य होता है।
श्लोक १६.८
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥८॥
अनुवाद: वे आसुरी लोग कहते हैं कि यह जगत असत्य है, इसका कोई आधार नहीं है, इसका कोई ईश्वर (नियंता) नहीं है, और यह स्त्री-पुरुष के संयोग से केवल काम के कारण उत्पन्न हुआ है – इसके अलावा इसका और कोई कारण नहीं है।
श्लोक १६.९
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥९॥
अनुवाद: इस दृष्टि को अपनाकर, जिनका नाश हो चुका है ऐसे अल्पबुद्धि और उग्र कर्म करने वाले क्रूर मनुष्य जगत के अहित के लिए शत्रु रूप में प्रवृत्त होते हैं।
श्लोक १६.१०
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥१०॥
अनुवाद: कभी न भरने वाली कामना का आश्रय लेकर, पाखंड, मान और मद से युक्त होकर, मोह के कारण गलत धारणाओं को ग्रहण करके और अशुद्ध व्रतों को धारण करके वे आचरण करते हैं।
श्लोक १६.११–१२
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥११॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥१२॥
अनुवाद: मृत्युपर्यंत रहने वाली अपार चिंताओं को पकड़े हुए, कामभोगों को ही अपना परम लक्ष्य मानने वाले और यही सब कुछ है – ऐसा निश्चय करने वाले; सैकड़ों आशाओं के पाश में बंधे हुए, काम और क्रोध के परायण होकर वे लोग कामभोगों के लिए अन्यायपूर्वक धन का संचय करने की इच्छा रखते हैं।
श्लोक १६.१३–१५
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥१३॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥१४॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥१५॥
अनुवाद: वे सोचते हैं: “आज मैंने यह प्राप्त कर लिया है, और इस मनोरथ को अब मैं पूरा करूँगा। यह धन मेरे पास है, और भविष्य में भी यह और बढ़ेगा। वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया है, और अन्य शत्रुओं को भी मैं ही मारूँगा। मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही भोगी हूँ, मैं ही सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ। मैं सबसे धनवान और कुलीन हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनंद मनाऊँगा” – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।
श्लोक १६.१६
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥१६॥
अनुवाद: अनेक प्रकार की चिंताओं से भ्रमित, मोह के जाल से घिरे हुए, और कामभोगों में अत्यधिक आसक्त वे लोग गंदे नरक में गिरते हैं।
श्लोक १६.१७
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥१७॥
अनुवाद: अपने आप को बहुत बड़ा मानने वाले, हठी, धन और मान के मद से मत्त हुए वे लोग दंभ के कारण केवल नाममात्र के लिए विधि-शून्य यज्ञ करते हैं।
श्लोक १६.१८
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१८॥
अनुवाद: अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध का आश्रय लेने वाले, तथा अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करने वाले वे पापी लोग ईर्ष्यालु होते हैं।
श्लोक १६.१९
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥१९॥
अनुवाद: उन क्रूर, द्वेष करने वाले, और मनुष्यों में नीच स्वभाव वाले लोगों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ।
श्लोक १६.२०
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥२०॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! वे मूढ़ लोग जन्म-जन्मांतर में आसुरी योनियों को प्राप्त होते हुए मुझको न पाकर उससे भी और अतिशय अधम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक १६.२१
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥२१॥
अनुवाद: नरक के ये तीन द्वार – काम, क्रोध और लोभ – आत्मा का नाश करने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
श्लोक १६.२२
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥२२॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! जो मनुष्य नरक के इन तीनों द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण का आचरण करता है और अंत में परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक १६.२३
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥२३॥
अनुवाद: जो पुरुष शास्त्र विधि को छोड़कर अपनी इच्छा (मनमानी) से आचरण करता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है, न सुख को, और न ही परम गति को।
श्लोक १६.२४
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥२४॥
अनुवाद: इसलिए तेरे लिए क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है, इसके निर्धारण में शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्र की विधियों को जानकर तुझे इस संसार में अपने कर्म करने चाहिए।
अध्याय १७: श्रद्धात्रयविभागयोग
Shraddhatraya Vibhaga Yoga
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श्लोक १७.१
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो लोग शास्त्र की विधि को छोड़कर केवल श्रद्धा से युक्त होकर पूजा (यज्ञ) करते हैं, उनकी स्थिति किसमें है – सत्त्वगुण में, रजोगुण में या तमोगुण में?
श्लोक १७.२
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥२॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: मनुष्यों की वह स्वभाव से उत्पन्न होने वाली श्रद्धा तीन प्रकार की होती है – सात्त्विकी, राजसी और तामसी। इसे मुझसे सुन।
श्लोक १७.३
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥३॥
अनुवाद: हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है; जैसी जिसकी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही होता है।
श्लोक १७.४
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥४॥
अनुवाद: सात्त्विक लोग देवताओं की पूजा करते हैं, राजस लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं, तथा तामस लोग प्रेतों और भूतगणों की पूजा करते हैं।
श्लोक १७.५–६
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥५॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥६॥
अनुवाद: जो मनुष्य दंभ और अहंकार से युक्त, तथा काम, आसक्ति और बल के अभिमान से भरे हुए, शास्त्रों द्वारा विहित न किए गए घोर तप को तपते हैं; जो शरीर के भीतर रहने वाले भूत-समूह को और शरीर के भीतर स्थित मुझ अंतर्यामी को भी कष्ट देते हैं – उन अज्ञानी पुरुषों को तू आसुरी स्वभाव वाले जान।
श्लोक १७.७
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥७॥
अनुवाद: भोजन भी सभी को अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है; वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। उनके इन भेदों को सुन।
श्लोक १७.८
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८॥
अनुवाद: आयु, बुद्धि, बल, आरोग्यता, सुख और प्रेम को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले और हृदय को प्रिय लगने वाले आहार सात्त्विक पुरुषों को प्रिय होते हैं।
श्लोक १७.९
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥९॥
अनुवाद: बहुत कड़वे, खट्टे, नमकीन, अति गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले आहार – जो दुख, शोक और रोग को उत्पन्न करने वाले हैं – राजस मनुष्यों को प्रिय होते हैं।
श्लोक १७.१०
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥१०॥
अनुवाद: जो भोजन अधपका (या बासी), रसहीन, दुर्गंधयुक्त, सड़ा हुआ, झूठा और अपवित्र है, वह भोजन तमोगुण वाले मनुष्यों को प्रिय होता है।
श्लोक १७.११
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥११॥
अनुवाद: जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वाले पुरुषों द्वारा शास्त्र विधि के अनुसार किया जाता है और जिसमें केवल कर्तव्य समझकर मन को लगाया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है।
श्लोक १७.१२
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥१२॥
अनुवाद: किंतु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ केवल दिखावे के लिए या फल की इच्छा को सामने रखकर किया जाता है, उसे तू राजस यज्ञ जान।
श्लोक १७.१३
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥१३॥
अनुवाद: जो यज्ञ शास्त्र विधि के विपरीत, बिना अन्न के प्रसाद बाँटे, बिना मंत्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किया जाता है, उसे तामस यज्ञ कहा जाता है।
श्लोक १७.१४
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥१४॥
अनुवाद: देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानी जनों की पूजा, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा – यह शरीर संबंधी तप कहलाता है।
श्लोक १७.१५
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥१५॥
अनुवाद: किसी को उद्वेग (कष्ट) न पहुँचाने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी वचन बोलना, तथा वेदों का स्वाध्याय करना – यह वाणी का तप कहा जाता है।
श्लोक १७.१६
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥१६॥
अनुवाद: मन की प्रसन्नता, शांत स्वभाव, मौन (मन का संयम), अंतःकरण की शुद्धि और भावों की निर्मलता – यह मन का तप कहा जाता है।
श्लोक १७.१७
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥१७॥
अनुवाद: फल की इच्छा न रखने वाले योगियों द्वारा अत्यंत श्रद्धा के साथ किए गए इस त्रिविध (तीन प्रकार के) तप को सात्त्विक तप कहा जाता है।
श्लोक १७.१८
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥१८॥
अनुवाद: जो तप सत्कार, मान और पूजा प्राप्त करने के लिए दंभपूर्वक किया जाता है, वह राजस तप कहलाता है, जो अनिश्चित और नाशवान होता है।
श्लोक १७.१९
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥१९॥
अनुवाद: जो तप मूढ़ता के कारण अपनी आत्मा को पीड़ा देकर या दूसरों का नाश करने के लिए किया जाता है, वह तामस तप कहा जाता है।
श्लोक १७.२०
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥२०॥
अनुवाद: ‘दान देना ही कर्तव्य है’ – इस भाव से जो दान उचित देश, काल और पात्र को, बदले में उपकार की आशा किए बिना दिया जाता है – वह दान सात्त्विक माना गया है।
श्लोक १७.२१
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥२१॥
अनुवाद: किंतु जो दान बदले में किसी प्रत्युपकार की आशा से या फल को उद्देश्य रखकर, तथा बड़े क्लेश (अनिच्छा) के साथ दिया जाता है, वह राजस दान कहा गया है।
श्लोक १७.२२
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥२२॥
अनुवाद: जो दान बिना उचित देश-काल के, कुपात्रों को, बिना सत्कार के और अपमानपूर्वक दिया जाता है, वह तामस दान कहा जाता है।
श्लोक १७.२३
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३॥
अनुवाद: ‘ॐ‘, ‘तत्‘, ‘सत्’ – यह ब्रह्म का तीन प्रकार का निर्देश कहा गया है। इसी से आदि काल में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गए थे।
श्लोक १७.२४
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४॥
अनुवाद: इसलिए ब्रह्मवादियों की यज्ञ, दान और तप रूपी क्रियाएँ हमेशा ‘ॐ’ इस शब्द का उच्चारण करके ही शास्त्र विधि के अनुसार आरंभ होती हैं।
श्लोक १७.२५
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥२५॥
अनुवाद: फल की इच्छा न रखकर केवल ‘तत्’ इस शब्द का उच्चारण करके मोक्ष की इच्छा रखने वाले पुरुषों द्वारा विभिन्न प्रकार की यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ की जाती हैं।
श्लोक १७.२६–२७
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥२६॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥२७॥
अनुवाद: हे पार्थ! ‘सत्’ शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ भाव और उत्तम भाव में किया जाता है, तथा मंगलमय कर्मों में भी ‘सत्’ शब्द ही जोड़ा जाता है। यज्ञ, तप और दान में जो स्थिरता है, उसे भी ‘सत्’ कहा जाता है, और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी ‘सत्’ ही कहलाता है।
श्लोक १७.२८
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥२८॥
अनुवाद: हे पार्थ! बिना श्रद्धा के किया गया हवन, दिया गया दान, तप और अन्य जो भी कर्म किया जाता है, वह ‘असत्’ कहलाता है – वह न तो इस लोक में फल देता है और न ही परलोक में।
अध्याय १८: मोक्षसंन्यासयोग
Moksha Sannyasa Yoga
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श्लोक १८.१
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास के तत्व को और त्याग के तत्व को अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
श्लोक १८.२
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥२॥
अनुवाद: श्री भगवान ने कहा: ज्ञानी पुरुष काम्य कर्मों (कामनायुक्त कर्मों) के त्याग को ‘संन्यास’ जानते हैं, और सभी कर्मों के फलों के त्याग को विद्वान् लोग ‘त्याग’ कहते हैं।
श्लोक १८.३
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥३॥
अनुवाद: कुछ मनीषी पुरुष ऐसा कहते हैं कि कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्यागने योग्य है, किंतु दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
श्लोक १८.४
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥४॥
अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! इस त्याग के विषय में मेरा निश्चित निर्णय सुन। हे पुरुषव्याघ्र! त्याग वास्तव में तीन प्रकार का कहा गया है।
श्लोक १८.५
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥५॥
अनुवाद: यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि वह करने योग्य ही है; क्योंकि यज्ञ, दान और तप – ये तीनों ही मनस्वी पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं।
श्लोक १८.६
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥६॥
अनुवाद: किंतु हे पार्थ! इन कर्मों को भी आसक्ति और फलों का त्याग करके कर्तव्य समझकर करना चाहिए – यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
श्लोक १८.७
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥७॥
अनुवाद: नियत (शास्त्रोक्त) कर्म का स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। मोह के कारण उसका त्याग कर देना तमोगुण का त्याग कहा गया है।
श्लोक १८.८
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥८॥
अनुवाद: जो कर्म शारीरिक कष्ट के भय से “यह दुखदायक है” ऐसा समझकर छोड़ देता है, वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक १८.९
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥९॥
अनुवाद: हे अर्जुन! जो नियत कर्म केवल ‘यह कर्तव्य है’ ऐसा समझकर, आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है, वह सात्त्विक त्याग माना गया है।
श्लोक १८.१०
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥१०॥
अनुवाद: जो मनुष्य प्रतिकूल कर्म से द्वेष नहीं करता और अनुकूल कर्म में आसक्त नहीं होता, वह सत्त्वगुण से युक्त, बुद्धिमान और संशयरहित सच्चा त्यागी है।
श्लोक १८.११
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥११॥
अनुवाद: शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा संपूर्ण कर्मों को पूरी तरह त्यागना संभव नहीं है; किंतु जो मनुष्य कर्मों के फल का त्याग करता है, वही वास्तव में ‘त्यागी’ कहा जाता है।
श्लोक १८.१२
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥१२॥
अनुवाद: कर्मों का फल तीन प्रकार का होता है – अवांछित, वांछित और मिला-जुला – जो कर्म फल का त्याग नहीं करते, उन्हें मृत्यु के बाद अपने कर्मों के अनुसार यह फल मिलता है, किंतु संन्यासियों (फलत्यागियों) को कभी नहीं मिलता।
श्लोक १८.१३
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१३॥
अनुवाद: हे महाबाहो! संपूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिए सांख्य शास्त्र (वेदांत) में ये पाँच कारण बताए गए हैं, उन्हें मुझसे समझ ले।
श्लोक १८.१४
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥१४॥
अनुवाद: वे पाँच कारण हैं – शरीर (अधिष्ठान), कर्ता, विभिन्न प्रकार के करण (इंद्रियाँ), अलग-अलग प्रकार की चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव (भाग्य या अदृश्य शक्ति)।
श्लोक १८.१५
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१५॥
अनुवाद: मनुष्य शरीर से, वाणी से और मन से जो भी उचित या अनुचित कर्म आरंभ करता है, उसके ये पाँचों कारण होते हैं।
श्लोक १८.१६
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥१६॥
अनुवाद: ऐसा होने पर भी जो अशुद्ध बुद्धि वाला मनुष्य अपनी आत्मा को (जो कि वास्तव में अकर्ता है) अकेला ही सबका कर्ता समझता है, वह दुर्बुद्धि मनुष्य तत्व को नहीं देखता।
श्लोक १८.१७
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१७॥
अनुवाद: जिसके मन में अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि किसी भी रूप में आसक्त नहीं होती, वह यदि इन सारे लोकों को भी मार डाले, तो भी वह न तो किसी को मारता है और न ही बंधन में बंधता है।
श्लोक १८.१८
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥१८॥
अनुवाद: ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता – यह तीन प्रकार की कर्म की प्रेरणा है; तथा करण, कर्म और कर्ता – यह तीन प्रकार का कर्म का संग्रह है।
श्लोक १८.१९
ज्ञानं कर्म च कर्ताच त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥१९॥
अनुवाद: गुणसंख्यान (सांख्य शास्त्र) के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता – ये तीनों भी गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं। उन्हें भी मुझसे भली-भांति सुन।
श्लोक १८.२०
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥२०॥
अनुवाद: जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सभी अलग-अलग दिखने वाले प्राणियों में एक ही अविनाशी और सम भाव को देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान।
श्लोक १८.२१
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥२१॥
अनुवाद: किंतु जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य विभिन्न प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के नाना भावों और पृथक सत्त्वों को देखता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।
श्लोक १८.२२
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥२२॥
अनुवाद: और जो ज्ञान किसी एक कार्य (जैसे शरीर आदि) में ही बिना किसी यथार्थ कारण के संपूर्ण मानकर आसक्त रहता है, जो अवास्तविक, तुच्छ और सारहीन है, वह तामस ज्ञान कहा गया है।
श्लोक १८.२३
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥२३॥
अनुवाद: जो नियत कर्म आसक्ति से रहित, राग-द्वेष से दूर और फल की इच्छा न रखने वाले पुरुष द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक कर्म कहलाता है।
श्लोक १८.२४
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥२४॥
अनुवाद: किंतु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है और कामनाओं को चाहने वाले या अहंकार से भरे हुए मनुष्य द्वारा किया जाता है, वह राजस कर्म कहा गया है।
श्लोक १८.२५
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥२५॥
अनुवाद: जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोह के कारण आरंभ किया जाता है, वह तामस कर्म कहा जाता है।
श्लोक १८.२६
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥२६॥
अनुवाद: जो कर्ता आसक्ति से रहित, अहंकाररहित, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सिद्धि और असिद्धि में समान रहने वाला है, वह ‘सात्त्विक कर्ता’ कहा जाता है।
श्लोक १८.२७
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥२७॥
अनुवाद: जो कर्ता आसक्ति से युक्त, कर्मों के फल को चाहने वाला, लोभी, दूसरों को कष्ट देने वाला (हिंसात्मक), अशुचि (अपवित्र), तथा हर्ष और शोक से युक्त है, वह ‘राजस कर्ता’ कहा गया है।
श्लोक १८.२८
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥२८॥
अनुवाद: जो कर्ता अयुक्त (असंयमी), अशिक्षित (प्राकृत), घमंडी, शठ, दूसरों की जीविका छीनने वाला (नैष्कृतिक), आलसी, विषादी और काम को बहुत लंबी अवधि तक टालने वाला (दीर्घसूत्री) है, वह ‘तामस कर्ता’ कहा जाता है।
श्लोक १८.२९
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥२९॥
अनुवाद: हे धनंजय! अब तू गुणों के अनुसार बुद्धि और धैर्य के भी तीन प्रकार के भेदों को मुझसे विस्तारपूर्वक सुन।
श्लोक १८.३०
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥३०॥
अनुवाद: हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को, तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है, वह बुद्धि ‘सात्त्विकी’ है।
श्लोक १८.३१
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥३१॥
अनुवाद: हे पार्थ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को यथार्थ रूप से नहीं जानता (विपरीत समझता) है, वह बुद्धि ‘राजसी’ है।
श्लोक १८.३२
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥३२॥
अनुवाद: हे पार्थ! जो बुद्धि अंधकार से ढकी हुई अधर्म को ही धर्म मान लेती है और अन्य सभी बातों को भी विपरीत ही समझती है, वह बुद्धि ‘तामसी’ है।
श्लोक १८.३३
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥३३॥
अनुवाद: हे पार्थ! जिस अटूट धैर्य के द्वारा मनुष्य योग (मन-इंद्रियों के संयम) के माध्यम से मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को सदा वश में रखता है, वह धैर्य ‘सात्त्विक’ है।
श्लोक १८.३४
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥३४॥
अनुवाद: हे अर्जुन! किंतु जिस धैर्य के द्वारा फल की इच्छा रखने वाला मनुष्य अत्यंत आसक्ति के साथ धर्म, अर्थ और काम का सेवन करता है, वह धैर्य ‘राजसी’ है।
श्लोक १८.३५
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥३५॥
अनुवाद: हे पार्थ! दुर्बुद्धि मनुष्य जिस धैर्य के कारण स्वप्न (आलस्य), भय, शोक, विषाद और मद (उन्माद/घमंड) को नहीं छोड़ता, वह धैर्य ‘तामसी’ है।
श्लोक १८.३६
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥३६॥
अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी मुझसे सुन, जिसके अभ्यास से मनुष्य आनंदित होता है और दुखों के अंत को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक १८.३७
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥३७॥
अनुवाद: जो सुख आरंभ में विष के समान प्रतीत होता है, किंतु परिणाम में अमृत के समान आनंददायक होता है – वह आत्मबुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होने वाला सुख ‘सात्त्विक’ कहा गया है।
श्लोक १८.३८
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥३८॥
अनुवाद: जो सुख विषयों और इंद्रियों के संयोग से आरंभ में अमृत के समान प्रतीत होता है, किंतु परिणाम में विष के समान दुखदायी होता है – वह सुख ‘राजस’ माना गया है।
श्लोक १८.३९
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥३९॥
अनुवाद: जो सुख आरंभ में और परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, तथा निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है – वह सुख ‘तामस’ कहा गया है।
श्लोक १८.४०
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥४०॥
अनुवाद: पृथ्वी पर या स्वर्ग में देवताओं के बीच ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से पूरी तरह मुक्त हो।
श्लोक १८.४१
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥४१॥
अनुवाद: हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म उनके अपने स्वभाव के गुणों के अनुसार अलग-अलग बाँटे गए हैं।
श्लोक १८.४२
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥४२॥
अनुवाद: शम (मन का शमन), दम (इंद्रियों का दमन), तपस्या, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य (ईश्वर में विश्वास) – ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
श्लोक १८.४३
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥४३॥
अनुवाद: शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुराई, युद्ध से पीठ न दिखाना, दान देना और प्रभुत्व (नेतृत्व) – ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
श्लोक १८.४४
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥४४॥
अनुवाद: खेती, गौ-पालन और व्यापार (वाणिज्य) – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं, और सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।
श्लोक १८.४५
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥४५॥
अनुवाद: मनुष्य अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्पर रहकर ही परम सिद्धि को प्राप्त करता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को प्राप्त करता है, उसे सुन।
श्लोक १८.४६
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥४६॥
अनुवाद: जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह संपूर्ण जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.४७
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥४७॥
अनुवाद: अच्छी तरह आचरण किए गए दूसरे के धर्म (कर्म) से, गुणहीन होने पर भी अपना स्वधर्म श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत किए गए कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक १८.४८
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥४८॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! दोषयुक्त होने पर भी अपने स्वाभाविक कर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से वैसे ही ढके रहते हैं जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है।
श्लोक १८.४९
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥४९॥
अनुवाद: जिसकी बुद्धि हर जगह आसक्ति से रहित है, जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो सभी इच्छाओं से मुक्त है, वह संन्यास (कर्मफल के त्याग) के द्वारा उस परम ‘नैष्कर्म्य सिद्धि’ (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.५०
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥५०॥
अनुवाद: जो मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो चुका है, वह जिस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे हे कौन्तेय! तू संक्षेप में मुझसे जान, जो ज्ञान की पराकाष्ठा (निष्ठा) है।
श्लोक १८.५१–५३
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥५१॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥५२॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥५३॥
अनुवाद: शुद्ध बुद्धि से युक्त, धैर्य के द्वारा मन को वश में करने वाला; शब्द आदि विषयों को छोड़कर राग और द्वेष को दूर करने वाला; एकांत स्थान में रहने वाला, कम खाने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला; निरंतर ध्यान योग में तत्पर और वैराग्य का आश्रय लेने वाला; अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और संग्रह को त्यागकर – ममत्व से रहित और शांत पुरुष ब्रह्मभाव को प्राप्त होने के योग्य हो जाता है।
श्लोक १८.५४
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥५४॥
अनुवाद: ब्रह्म को प्राप्त हुआ, प्रसन्न अंतःकरण वाला पुरुष न तो किसी के लिए शोक करता है और न कोई कामना करता है। सभी प्राणियों में समान भाव रखने वाला वह भक्त मेरी परा भक्ति को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.५५
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥५५॥
अनुवाद: भक्ति के द्वारा ही वह मुझको (मेरे वास्तविक रूप को) जैसा हूँ वैसा तत्व से जानता है, और उस तत्व से जानकर वह तत्काल मुझमें प्रवेश कर जाता है।
श्लोक १८.५६
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥५६॥
अनुवाद: सभी कर्मों को हमेशा करता हुआ भी मेरे परायण हुआ भक्त मेरी कृपा से सनातन और अविनाशी परम पद को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.५७
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥५७॥
अनुवाद: संपूर्ण कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, बुद्धि-योग का आश्रय लेते हुए तू निरंतर मुझमें ही चित्त वाला हो जा।
श्लोक १८.५८
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥५८॥
अनुवाद: मुझमें चित्त लगाने से तू मेरी कृपा से सभी कठिनाइयों को पार कर जाएगा; किंतु यदि अहंकार के कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा, तो नष्ट हो जाएगा।
श्लोक १८.५९
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥५९॥
अनुवाद: अहंकार का आश्रय लेकर यदि तू यह सोचता है कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा,” तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरी प्रकृति तुझे जबरन युद्ध में प्रवृत्त कर देगी।
श्लोक १८.६०
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत् ॥६०॥
अनुवाद: हे कौन्तेय! अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म के द्वारा बँधा हुआ तू मोह के कारण जो कर्म नहीं करना चाहता, उसे भी विवश होकर करेगा।
श्लोक १८.६१
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥६१॥
अनुवाद: हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है, और अपनी माया से सभी प्राणियों को शरीर रूपी यंत्र पर आरूढ़ (सवार) कराकर घुमाता रहता है।
श्लोक १८.६२
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥६२॥
अनुवाद: हे भारत! तू सब प्रकार से उसी परमेश्वर की शरण में जा। उसी की कृपा से तू परम शांति और सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।
श्लोक १८.६३
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥६३॥
अनुवाद: इस प्रकार यह मैंने तुझे अति गोपनीय से भी अधिक गोपनीय ज्ञान कह दिया है। इस संपूर्ण रहस्य को अच्छी तरह विचार कर, जैसा तू चाहता है वैसा कर।
श्लोक १८.६४
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥६४॥
अनुवाद: संपूर्ण गोपनीयों में भी अति गोपनीय मेरे इस परम वचन को तू फिर से सुन। तू मुझे बहुत प्रिय है, इसलिए मैं तेरे हित की बात कहूँगा।
श्लोक १८.६५
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥६५॥
अनुवाद: तू मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर और मुझे नमस्कार कर। तू निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगा – यह मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मुझे बहुत प्रिय है।
श्लोक १८.६६
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥६६॥
अनुवाद: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को मुझमें त्यागकर तू केवल मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर।
श्लोक १८.६७
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥६७॥
अनुवाद: इस गोपनीय गीता का उपदेश न तो कभी किसी तपहीन को करना चाहिए, न भक्तिहीन को, न सेवा न करने वाले को, और न ही मुझसे द्वेष करने वाले को।
श्लोक १८.६८
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥६८॥
अनुवाद: जो पुरुष मेरे इन परम गोपनीय रहस्यों को मेरे भक्तों के सामने कहेगा, वह मुझमें परा भक्ति को प्राप्त करके निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगा।
श्लोक १८.६९
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥६९॥
अनुवाद: मनुष्यों में ऐसा मेरा कोई प्रिय कार्य करने वाला नहीं है, और न कभी पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा कोई दूसरा प्रिय होगा।
श्लोक १८.७०
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥७०॥
अनुवाद: और जो पुरुष हमारे इस धर्मयुक्त संवाद को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञान-यज्ञ से पूजित होऊँगा – ऐसा मेरा मत है।
श्लोक १८.७१
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥७१॥
अनुवाद: जो मनुष्य श्रद्धा से युक्त और दोष-दृष्टि से रहित होकर केवल सुनता भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यकर्म करने वालों के उत्तम लोकों को प्राप्त होता है।
श्लोक १८.७२
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥७२॥
अनुवाद: हे पार्थ! क्या इसे तूने एकाग्र चित्त से सुना? हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञान और मोह दूर हो गया है?
श्लोक १८.७३
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥७३॥
अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति (ज्ञान) प्राप्त हो गई है। अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, और आपकी आज्ञा के अनुसार ही कार्य करूँगा।
श्लोक १८.७४
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥७४॥
अनुवाद: संजय ने कहा: इस प्रकार मैंने वासुदेव (श्रीकृष्ण) और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देने वाले संवाद को सुना।
श्लोक १८.७५
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥७५॥
अनुवाद: महर्षि व्यास की कृपा से मैंने इस अत्यंत गोपनीय योग को स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से कहते हुए सुना है।
श्लोक १८.७६
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥७६॥
अनुवाद: हे राजन्! श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस पवित्र और अद्भुत संवाद को बार-बार याद करके मैं अत्यधिक हर्षित हो रहा हूँ।
श्लोक १८.७७
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७॥
अनुवाद: और हे राजन्! श्री भगवान के उस अति अद्भुत विश्वरूप को बार-बार याद करके मेरे मन में महान विस्मय हो रहा है, और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
श्लोक १८.७८
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥७८॥
अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गांडीवधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री (समृद्धि), विजय, असाधारण शक्ति और नीति अचल रूप से निश्चित हैं – ऐसा मेरा मत है।